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बीबीसी माफ करना, मैं हिंदुस्तानी हूं

BBC-रवींद्र रंजन

मेरा कसूर सिर्फ इतना था कि मैंने बीबीसी की भाषा को लेकर एक स‌वाल उठाया था। सवाल यह था कि दुनिया का सबसे खतरनाक आतंकी और इंसानियत का दुश्मन ओसामा बिन लादेन सम्मान का हकदार कैसे? अभी तक तो हमने यही सुना है कि व्यक्ति के कर्म ही उसे महान बनाते हैं। कर्म ही सम्मान का हकदार बनाते हैं। लेकिन बीबीसी के लिए एक आतंकवादी भी सम्मानित है। कल्पना कीजिए कि अगर मुंबई हमले का गुनहगार आमिर अजमल कसाब बीमार हो जाए तो उसके बारे में लिखी गई बीबीसी की खबर का शीर्षक क्या होगा। शायद वह लिखेगा, 'बीमार हैं कसाब' या फिर 'बीमार हुए कसाब'। अब आप सोचिए कि कसाब के बारे में ऐसा संबोधन पढ़कर एक हिंदुस्तानी को कैसा लगेगा? हालांकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें बीबीसी के इन भाषाई तौर-तरीकों में कोई बुराई नजर नहीं आती। वो बड़ी ही बेशर्मी से इसे बीबीसी की 'निष्पक्ष' पत्रकारिता कहते हैं। ऐसे लोगों से मैं पूछना चाहता हूं कि क्या वो महात्मा गांधी के हत्यारे के लिए ऐसा सम्मानजनक संबोधन पसंद करेंगे? क्या वो इंदिरा गांधी के कातिल के लिए 'उन्हें' या 'वे' जैसे संबोधन स्वीकार कर पाएंगे?  [पूरा पढ़ें] 


aबदनसीबों की मौत पर आंसू न बहाओ, जश्न मनाओ राहुल की शादी है

-आशीष जैन

राहुल की शादी है और जश्न है हिदुस्तान का...दूसरी तरफ इस चकाचौंध से बहुत दूर एक गांव है जहाँ कुछ देर पहले एक साधु आया था।पता नहीं क्या हुआ, वहां अब सन्नाटा पसरा है। पीछे से एक मां के कराहने की आवाज़ आ रही है जिसकी रुलाइयां है जो रोके रुक नहीं रहीं। वो सन्नाटे से आगे निकल कर उस आस्था पर सवाल उठा रही हैं जिसे वक्त-वक्त पर कोईन कोई साधु उसकी असफलता के साथ जोड़कर उसके पल्लू से बाँध देता है और फिर राम के नाम में विश्वास जताता है। वो एक रुमाल एक लौटा और बीस रुपये बाटता है तभी एक चीख पुकार आती है। कई लोग बदहवासी में इधर उधर भागने लगे।भीड़ अपनों और परायों में भेद नहीं कर पाई और फिर हर तरफ मातम। लोग बिखरे हुए थे।देश की संसद के साधु अपनी सियासत को खीच कर उस मां के कंधे पर हाथ रख रहे हैं, लेकिन वो आका भी सफलता और असफलता के बीच फस रहे हैं। बड़ी-बड़ी गाड़ियां इससे पहले उस जगह कभी नहीं आई। उस मां ने इतने करीब से इन लोगों को कभी नहीं देखा। एक सवाददाता तभी तल्खी से माइक निकालकर यह बात कहता है, हमने कई साल से आपको कई खबरें दिखाई है लेकिन आज मैं इन लाशों के बीच मौजूद हूं। तभी वो स‌ंवाददाता अचानक अपनी पीटीसी ख़त्म कर देता है और वो कहता है आज मेरे पास शब्द नहीं हैं। उसकी आँखों में आंसू है, जो दर्शक जानता है, वो फूट फूट कर रोता है। [पूरा पढ़ें] 

पंडित गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कारों का ऎलान

bprdRनई दिल्ली। पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो (BPRD) ने स‌ाल 2009-2010 के लिए पंडित गोविंद बल्लभ पंत पुरस्कारों की घोषणा की है। इसके लिए अलग-अलग विषयों पर पुस्तकें लिखने के लिए बतौर पुरस्कार 30 स‌े 40 हजार तक की राशि दी जाती है। स‌ाथ ही ब्यूरो की तरफ स‌े लेखकों की पुस्तकों का प्रकाशन भी किया जाता है। इस बार छह विषयों के तहत पुरस्कार के लिए लेखकों/पत्रकारों का चयन किया गया है। ब्यूरो को प्राप्त आवेदनों में छह लेखकों का चुनाव किया गया। इस चुनाव के लिए ब्यूरो के महानिदेशक प्रसून मुखर्जी की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया जाता है। पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो स‌ाल 1982 से हिंदी में पुस्तकें उपलब्ध कराने के लिए यह योजना चला रहा है। 'वैध स‌मस्याओं के निदान के लिए हिंसा की बढ़ती प्रवृत्ति' विषय पर पुस्तक के लिए जी न्यूज के प्रोड्यूसर राकेश प्रकाश को 40 हजार रुपये का पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। 'अपराधियों का सुधार एवं पुनर्वास' विषय पर पुस्तक लेखन के लिए नीना लांबा को भी 40 हजार रुपये का पुरस्कार दिया गया है। इसके अलावा 'स‌ाइबर क्राइम' पर पुस्तक के लिए संतोष शुक्ल, 'चिकित्सीय न्यायशास्त्र एवं विधि विज्ञान' के लिए शैलेंद्र कुमार अवस्थी, 'कानूनी उपचार विधि' के लिए स‌ुरेश ओझा और 'आतंकवाद व मनोवृत्ति का विकृत उन्माद' पुस्तक के लिए ज्योति शंकर चौबे को 30-30 हजार रुपये का पुरस्कार दिया जाएगा। वॉयस ऑफ मीडिया की तरफ स‌े स‌भी स‌फल आवेदकों को बधाई और शुभकामनाएं।

आइये अपना अखबार निकालें-1

वॉयस ऑफ मीडिया के पाठकों ने कई बार हमस‌े इस विषय में जानना चाहा है कि अपना एक अखबार या पत्रिका निकालने के लिए उन्हें क्या करना होगा। पाठकों की इसी मांग को देखते हुए हम किस्तों में यह जानकारी उपलब्ध करा रहे हैं। जानकारी दे रहे हैं वरिष्ठ लेखक शिवप्रसाद भारती। आपको यह आलेख कैसा लगा, इस स‌ंबंध में अपनी प्रतिक्रियाओं स‌े जरूर अवगत कराएं। कोई स‌ंशय या स‌वाल हो तो बेहिचक हमें मेल करें-संपादक।

paperअगर आप अपने आसपास होने वाली घटनाओं को लेकर स‌ंवेदनशील हैं, किसी के प्रति अन्याय और गलत बात, गलत रवैया देखकर आप आहत होते हैं। परेशान होते हैं। अपनी बात, अपना नजरिया लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं, तो इसके लिए बेहद स‌शक्त और स‌बसे पुराना जरिया है प्रिंट मीडिया। अगर आप स‌माज में होने वाली घटनाओं पर अपना कोई नजरिया रखते हैं। उसे व्यक्त करने की इच्छा रखते हैं तोआप खुद का अखबार या पत्रिका प्रकाशित कर स‌कते हैं। अखबार की ताकत के बारे में मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी ने कहा था, 'खींचो न कमान न तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो'। शायर ने जो स‌लाह दी है उसका मतलब अपना अखबार निकालने स‌े है। जिन दिनों यह बात कही गई उस वक्त इलेक्ट्रॉनिक और वेब मीडिया का विकास नहीं हुआ था शायद इसीलिए उन्होंने अखबार निकालने की राह दिखाई। लेकिन आज के दौर में भी अखबार की ताकत का कोई मुकाबला नहीं है। [पूरा पढ़ें]

रिपोर्टिंग में सतर्कता बरते मीडिया: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीarडिया को आगाह किया है कि वह आरुषि मर्डर केस की रिपोर्टिंग में सतर्कता बरते। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरुषि और उसके परिवार के सदस्यों की छवि के धूमिल न की जाए। जस्टिस अल्तमस कबीर और जस्टिस मार्कन्डेय काटजू की बेंच ने वकील डॉ. सूरत सिंह की याचिका पर यह आदेश दिया। याचिका में कहा गया कि नोएडा में हुए डबल मर्डर केस की रिपोर्टिंग में मीडिया ने पत्रकारिता की सीमाओं को लांघा और आरुषि के पिता डॉ. तलवार को बदनाम किया। इससे पिता-पुत्री के पवित्र रिश्ते को संदेह की नजर से देखा जाने लगा। बच्चों पर इसका बुरा असर पड़ा। जनहित याचिका पर आदेश पारित करने से पहले दोनों जजों ने आपस में काफी देर तक विचार-विमर्श किया। बातचीत के बाद जस्टिस कबीर ने आदेश सुनाया। जस्टिस कबीर ने कहा कि मीडिया को इस तरह की रिपोर्टिंग नहीं करनी चाहिए जिससे केस प्रभावित हो। बेंच ने याचिका पर सुनवाई की अगली तारीख 18 अगस्त तय की। याचिका में गृह और कानून मंत्रालय के अलावा विभिन्न मीडिया संगठनों को भी प्रतिवादी बनाया गया है।


रिपोर्टर या मीडिया के गुंडे?

Nalini-नलिनी तिवारी राजपूत

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आरूषि-हेमराज हत्याकांड की रिपोर्टिग से मीडिया को सबक लेना चाहिए। लेकिन क्या क्राइम रिपोर्टर या फिर न्यूज चैनल के लोग मानेंगे? बहस बहुत लंबी है और तकरीबन डेढ़ साल से चली आ रही है। जबसे 16 मई 2008 को आरूषि तलवार का बेरहमी से कत्ल किया गया था और अगले दिन सुबह शक किए जाने वाले नौकर हेमराज की भी लाश एल-32, जलवायु विहार, नोएडा से मिली थी। सभी न्यूज चैनल और अखबारवालों ने अपने अपने तरह से कयास लगाए। न्यूज चैनल द्वारा हायर किए गए प्राइवेट जासूसों और फॉरेन्सिक एक्सपर्ट ने भी तफ्तीश में कोई कोर कसर नही छोड़ी। लेकिन आरूषि-हेमराज की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को छोड़कर शायद ही किसी को पता हो कि आरूषि का घर यानि एल -32 एक 'पिकनिक स्पॉट' बन चुका था। कई रिपोर्टर्स और चैनल के बॉस वहां केवल घूमने के लिए पहुंचते थे। लोकतंत्र का चौथा खंबा कहलाने वाले पत्रकारिता की असंवेदनशीलता कई बार साफ झलक रही थी।

नोट- 1. ये लेख सत्य घटनाओं पर आधारित है। 2. कोई भी पात्र काल्पनिक नहीं है।

3. गालियों की जगह बीप बीप का इस्तेमाल किया गया है।

तारीख थी 16 मई 2008… सुबह करीब साढ़े 8 बजे थे। आरूषि की हत्या की खबर मिलते ही लगभग सारे न्यूज चैनल के रिपोर्टर और स्ट्रिंगर्स एल-32 जलवायु विहार पंहुच चुके थे। तत्कालीन एसपी बहुत जल्दी नतीजे पर पंहुच गए और नौकर हेमराज, जो कि वारदात वाली सुबह से गायब था, उसके ऊपर ईनाम घोषित करके उसे ही कातिल करार दे चुके थे। आरूषि की लाश पोस्टमॉर्टम के लिए पंहुच चुकी थी। पिता राजेश तलवार और नूपुर तलवार स्तब्ध थे। आंखो में आंसू तो नहीं था लेकिन उन्हें देखकर अंदाजा लगाया जा सकता था कि...[पूरा पढ़ें ]

अशोक स‌र बेटे के लिए लौट आइये न...


कुर्सी के लिए बेकरार अलग राज्य के पैरोकार

अंबिका सोनी को चलता करना चाहते हैं चैनलों के स‌ंपादक

मठाधीशों की धांधलियों का अड्डा अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय 

'तुम्हारा रेप करा देंगे किसी को पता भी नहीं चलेगा'

 रिश्तों के आईने में 'हिंदू विरोधी' मीडिया

पत्रकारिता के लिए अपने परिवार को भी दांव पर लगा दिया

 

NewsRoom

कथादेश के संपादक हरिनारायण को बृजलाल द्विवेदी सम्मान

Hariबिलासपुर। पंडित बृजलाल द्विवेदी स्मृति अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान के लिए इस बार दिल्ली से प्रकशित साहित्यिक पत्रिका कथादेशके संपादक हरिनारायण को चुना गया हैसाहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में दिये जाने वाले इस सम्मान में किसी साहित्यिक पत्रिका का श्रेष्ठ संपादन करने वाले संपादक को 11 हज़ार रुपये, शाल, श्रीफल एवं प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया जाता है। इससे पहले यह सम्मानवीणा’ (इंदौर) के यशस्वी संपादक डॉ. श्यामसुंदर व्यास औरदस्तावेज’ (गोरखपुर) के संपादक डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को दिया जा चुका है। मार्च 1948 में जन्मे हरिनारायण 1980 से साहित्यिक पत्रिका कथादेश का संपादन कर रहे हैं। वे हंस, विकासशील भारत, रूपकंचन के संपादन से भी जुड़े रहे हैं। सम्मान के लिए हरिनारायण का चयन पांच सदस्यीय निर्णायक मंडल ने किया, जिसमें नवनीत के संपादक विश्वनाथ सचदेव, सप्रे संग्रहालय, भोपाल के संस्थापक विजय दत्त श्रीधर, छत्तीसगढ़ हिन्दी ग्रंथ अकादमी के संचालक रमेश नैयर, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर के कुलपति सच्चिदानंद जोशी और साहित्य अकादमी के सदस्य गिरीश पंकज शामिल थे।

पत्रकार हिमांशु द्विवेदी को डाक्टरेट
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रायपुर। हरिभूमि समाचार पत्र समूह के प्रबंध संपादकहिमांशु द्विवेदी को माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय ने पीएचडी की उपाधि प्रदान की है। कला में स्नातक एवं पत्रकारिता में स्नातकोत्तर हिमांशु को यह उपाधि वैश्वीकरण और बाजारवाद की चुनौतियों के संदर्भ में हिन्दी पत्रकारिता का आलोचनात्मक अध्ययनविषय पर शोध के लिए दी गई है। हिमांशु द्विवेदी ने वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव एवं शिक्षाविद् डॉ. श्रीकांत सिंह के मार्गदर्शन में पीएचडी पूरी की है। डाक्टरेट की उपाधि मिलने पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल, शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल, नगरीय निकाय मंत्री राजेश मूणत, प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष सत्य नारायण शर्मा, विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष प्रेम प्रकाश पांडे, छत्तीसगढ़ क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष बलदेव सिंह भाटिया सहित साहित्य व पत्रकारिता जगत से जुड़े अनेक लोगों ने उन्हें बधाई दी है।

पत्रकारिता विवि के कुलाधिसचिव को भावभीनी विदाई

भोपाल। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के पूर्व कुलाधिसचिव (रेक्टर) ओपी दुबे को विश्वविद्यालय केप्राध्यापकों और कर्मचारियों ने भावभीनी विदाई दी। प्रेस काम्पलेक्स स्थित विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित समारोह में वक्ताओं ने ओपी दुबे के कार्यकाल को बेहतरीन बताते हुए उनके सुखद भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं। कम्प्यूटर विभाग के अध्यक्ष प्रो. चैतन्य पुरूषोत्तम अग्रवाल ने शाल-श्रीफल और पुस्तकें भेंटकर उन्हेंसम्मानित किया।विश्वविद्यालय की शोध परियोजना के निदेशक विजयदत्त श्रीधर ने इस अवसर पर कहा कि ओपीदुबे की उपस्थिति परिसर में एक नैतिक सत्ता की तरह थी। उन्होंने उम्मीद जतायी कि आने वाले अधिकारी भी इस सिलसिले को आगे बढ़ाएंगे। इलेक्ट्रानिक मीडिया विभाग के अध्यक्ष डॉ.श्रीकांत सिंह का कहना था कि ओपीदुबे के कार्यकाल में विश्वविद्यालय को विशिष्ट पहचान मिली। कार्यक्रम के आखिर में ओपी दुबे ने सबका आभार प्रकट किया।इस मौके कार्यकारी रेक्टर जे.आर झणाणे, कुलसचिव प्रकाश साकल्ले, प्रो. चैतन्य पुरूषोत्तम अग्रवाल, डॉ. पवित्र श्रीवास्तव, डॉ. अनुराग सीठा, तॉ. अविनाश वाजपेयी, राखी तिवारी, डॉ. रंजन सिंह, डॉ. महावीर सिंह, केसी मौली, डॉ. मोनिका वर्मा, मीता उज्जैन, सुनीता द्विवेदी, मनीष माहेश्वरी, पी.शशिकला, संजीव गुप्ता, गरिमा पटेल आदि मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने किया।

पत्रकार श्यामलाल यादव को आरटीआई अवार्ड
shyam
दिल्ली। हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार श्याम लाल यादव को सूचना अधिकार कानून का इस्तेमाल कर बेहतरीन रिपोर्टिंग करने के लिए आरटीआई अवार्ड देने की घोषणा की गई है। इस अवार्ड के साथ एक लाख रुपये नकद और प्रशस्ति पत्र दिया जाता है। श्यामलाल यादव राष्ट्रपति ऑफिस, सचिवालय, पीएमओ आदि में 1700 आरटीआई आवेदन दायर कर चुके हैं। श्यामलाल यादव उन पत्रकारों में हैं जिन्होंने भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से शुरुआती दौर में पत्रकारिता की पढ़ाई की है। कई प्रमुख अखबारों में काम कर चुके श्यामलाल यादव इस वक्त टीवी टुडे ग्रुप की हिंदी पत्रिका इंडिया टुडे में प्रिंसिपल करेसपांडेंट हैं। इससे पहले वह अमर उजाला में बतौर संवाददाता कार्यरत थे।

चंडीगढ़ भास्कर स‌े दो लोग पहुंचे अमर उजाला

चंडीगढ़। दैनिक भास्कर चंडीगढ़ स‌े दो लोगों के अमर उजाला चंडीगढ़ का रुख करने की खबर है। पिछले आठ स‌ाल स‌े भास्कर में काम कर रहे स‌ब एडीटर अरविंद धवन ने अब अमर उजाला को अपना नया ठिकाना बना लिया है। वहीं चंडीगढ़ स‌े दैनिक भास्कर के लिए स‌ीबीआई कवर करने वाले आशीष तिवारी ने भी अमर उजाला का दामन थाम लिया है। आशीष इसस‌े पहले भी अमर उजाला स‌े ही दैनिक भास्कर आए थे। चंडीगढ़ भास्करस‌े और भी तीन चार लोगअगले महीने लांच होने वाले दैनिक आज स‌माज ज्वाइन करने वाले हैं। बताया जा रहा है किएक-दो लोगों को तो ऑफर लेटर भी मिल चुका है।

TVPLUS

उम्मीदें हैं तभी तो आलोचना है

 

pressआजकल मीडिया की आलोचना बढ़ गई है। मीडिया को बार-बार उसके सरोकार और दायित्वबोध की याद दिलायी जा रही है। यह स‌ब हैरत में डालने वाला है। यहां तक कि कभी पुलिस, नेता और पाकिस्तान से आगे न जाने वाली मंचीय कवियों के निशाने पर भी मीडिया है। असल में यह मीडिया की बढ़ती ताकत का ही सबूत है। यह साबित करता है कि मीडिया से लोगों की अपेक्षाएं बहुत बढ़ गयी हैं। इसी वजह स‌े बाकी स्तंभों से ज्यादा याद मीडिया की होती है। आज हर तरफ स‌े मायूस लोग हर बीमारी को मीडिया ताकत से दूर करना चाहते हैं। पहले सभी दरवाजों से निराश आदमी अखबार से दफ्तर में आता था। आज वह सबसे पहले अखबार या न्यूज चैनल के दफ्तर में पहुंचकर इंसाफ मांगता है। स्टिंग आपरेशन और भ्रष्टाचार कथाओं तक पत्रकारों की पहुंच खोज से कम, जनता के सहयोग से...[पूरा पढ़ें] 

ये कैसा टीवी जो समाज को 'बीमार' कर रहा है?

tvभारत में बेलगाम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के इस दौर में प्रायोजित रियलिटी शो के नाम पर जो कुछ परोसा जा रहा है, उसे देखकर लगता है कि केंद्र सरकार गांधी जी के तीन बंदरों की शिक्षा पर सौ फीसदी अमल कर रही है। उसने तय कर लिया है कि टीवी पर परोसे जा रहे कार्यक्रमों के बारे में वह न कुछ बोलेगी, न देखेगी और न ही सुनेगी। ये कार्यक्रम संवेदनशील भारतीयों को बेचैन-हैरान कर रहे हैं। वर्जनाओं को तोड़ रहे हैं। ये उन भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं को ध्वस्त कर रहे हैं जिनके प्रति पश्चिमी देशों में भी सम्मान था। औद्योगिक घरानों के लिए 'सोने का अंडा देने वाली मुर्गी' बने इस टीवी ने विज्ञापन जुटाने की होड़ में ऐसे चौंकाने वाले कार्यक्रम परोसने शुरू कर दिए हैं जो हमारी मान्यताओं, विश्वासों और नैतिक वर्जनाओं की धज्जियां उड़ा रहे हैं। ये कार्यक्रम समाज में बीमारियां बांट रहे हैं...[पूरा पढ़ें]

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रोकना ही होगा अखबारों के इस 'काले धंधे' को 

जारी है अखबारों में 'मिलावट' के खिलाफ मुहिम

अब पानी स‌िर स‌े ऊपर चला गया है

मत पीटिए मीडिया के 'प्रोफेशनल' होने का ढिंढोरा

खबर लहरिया को यूनेस्को स‌म्मान

मीडिया में नौकरी दिलाने वालों स‌े स‌ावधान

खबरें जाएं भाड़ में, मुनाफा तो मनोरंजन में है

पत्रकार बेचारा, काम के बोझ का मारा

पांच मंडल के पत्रकारों को मान्यता की हरी झंडी

दूरदर्शन में अब भी है दम  

भाषाई स‌रोकार और मीडिया 

अब न्यूज चैनल की 'दुकान' खोलना आसान नहीं 

दागदार दिखा 2009 में  मीडिया का दामन

क्यों नहीं कर पाए स‌च का स‌ामना?

दोबारा शुरू हुआ एग्रीग्रेटर  ब्लॉगवाणी

कामयाबी उम्मीदें बढ़ाती है: विजेंद्र

जल्दी में हैं बाबा रामदेव?

मैडम फिजा कुछ तो तमीज स‌ीखिए... 

शर्मसार करता एक 'जनवादी' अखबार

भगवा ओढ़ने को बेकरार पीली छतरी वाले

जी की जय, बाकी चैनलों के लिए मंदी बनी शोषण का हथियार 

दिनामलार के स‌ंपादक को जमानत

अखबारों को ये क्या होता जा रहा है?

इतिहास हो गया जियो-सिटीज

'हम न तो कोई जवाब देंगे और न ही उन्हें गालियां देंगे'

अब हिंदी में होगा डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू...

हिंदी ब्लॉग जगत को तोहफा, नया एग्रीग्रेटर 'ब्लॉग प्रहरी' लांच

नहीं रहे खबरों के शिल्पकार डॉ. रामकष्ण पांडेय

आर्थिक पत्रकारिता: बढ़ रही है 'अर्थ' की अहमियत

अब आया यूएनआई टीवी

वीओआई शुरू, च्वाइस ऑफ इंडिया बनने की चाहत

हर चैनल की एक तमन्ना दिखना और बिकना है

हिंदुत्व के लिए अब कैसी जनक्रांति करेंगे कल्याण?

...तब गुरूजी जी पर ही इल्जाम क्यों? 

ब्लॉगिंग का मतलब स‌िर्फ अमिताभ बच्चन नहीं

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BeTheMedia

एक चैनल को जरूरत है मरने वाले की

tv'जरूरत है एक ऐसे व्यक्ति की, जो जानता हो कि उसे टर्मिनल इलनेस (लाइलाज बीमारी, जिससे मौत सुनिश्चित हो) है। उस पर हम ममी बनाने की मिस्त्र की प्राचीन तकनीक का इस्तेमाल करना चाहते हैं।' ऐसा ही एक विज्ञापन इन दिनों ब्रिटेन के लोकप्रिय चैनल-4 और फैल्क्रम टीवी ने कई अखबारों और पत्रिकाओं में दिया है। दरअसल, चैनल-4 ममी बनाने की प्रक्रिया की लाइव डॉक्युमेंटरी बनाना चाहता है। लंदन के दैनिक टेलीग्राफ ने खबर दी हैकि चैनल एक ब्रिटिश वैज्ञानिक के साथ मिलकर इस काम को अंजाम देना चाहता है। इस वैज्ञानिक का दावा है कि...[पूरा पढ़ें] 

बेशर्मों की ब्रेकिंग न्यूज 

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सर आम जनता बहुत ही उतेजित और रोमांचित है लेकिन हालात अभी नियंत्रण में हैं। मैंने भीड़ की राय जानने की कोशिश की है। खैर मैं इस बारे में बाद में बताऊंगा पहले पूरी घटना विस्तार से बताता हूं। जैसा कि आप देख रहे हैं, अभी वे बदमाश जो नशे में धुत हैं, उस लड़की के कपडे फाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। रही बात पुलिस की तो यहां से निकटतम पुलिस थाना महज़ एक किलोमीटर पर स्थित है लेकिन पुलिस अभी भी यहां नहीं पहुंची है। आपको क्या लगता है कि उस लड़की के साथ बलात्कार होने की कोई संभावना है...[पूरा पढ़ें] 

टीवी को खारिज कर पाना नामुमकिन

hक्या टेलीविजन पत्रकारिता से सरोकार गायब हो गए हैं। क्या टेलीविजिन बुद्धू बक्से से आगे नहीं बढ़ पाया। क्या ये सच्चाई है। जब इस सवाल पर दिमाग पर थोड़ा जोर डालता हूं तो...[पूरा पढ़ें]

स‌ेब बेचने वाली  एंकर, आलू बेचने वाला रिपोर्टर

vinodसेब बेच रही टीवी एंकर से सेब खरीद कर आगे बढ़ गया। उत्पात मचा रहे एक सांड़ से बचने के लिये मैं तेजी से पैर बढ़ा रहा था कि पीछे से आती आवाज को सुनकर पैरों में ब्रेक लग गए...[पूरा पढ़ें]

न्यूज चैनल का प्रोड्यूसर

Ravindraबॉस को देखते ही वह बहुत व्यस्त हो जाता है। कभी फोन पर चीखता है। कभी जूनियर्स पर चिल्लाता है। कभी स‌िस्टम पर गुस्सा उतारता है। एक्टिव इस कदर है कि कई बार तो... [पूरा पढ़ें]

बिहारी हो तो मीडिया में नौकरी पक्की!

vineet ज्यादा बनो मत, स्साले बिहारी, तुम लोगों को तो बुलाकर नौकरी दी जाएगी। इसी लाइन को सुन-सुनकर कुछेक साउथ इंडियन क्लासमेट स्साले बिहारी बोलना सीख गयी थी और हम उन पर फिदा हो जाते...[पूरा पढ़ें]

न्यूज चैनल के लिए चाहिए

reporterआवेदक के अपराधियों से लेकर पुलिसवालों से अच्छे संबंध होने चाहिए। अगर आवेदक खुद ब्लैकमैलिंग,  चोरी, लूट बलात्कार जैसे अपराध में जेल जा चुका है या...[पूरा पढ़ें]

मीडिया का शार्ट कट 

ashishलड़की कुछ अधिक समझदार थी। दिल्ली के राष्ट्रीय चैनल में तरक्की पर तरक्की पाए जा रही थी। मीडिया में चर्चा थी। वह आजकल मिस्टर झा की खास हैं। देखते देखते वह चाय की दुकान से लेकर...[पूरा पढ़ें]

स‌ंपादक के नाम पत्र

LettersToTheEditorमैंने अपनी कई रचनायें भी आपको प्रकाशनार्थ भेजी थीं, लेकिन पता नहीं क्यों वो प्रकाशित नहीं हुईं। जरूर वो आप जैसे विद्वान की आंखों के सामने से नहीं गुजर सकी होंगी। मैं बचपन से ही...[पूरा पढ़ें]

मेरे पास तो कोई प्लान नहीं है बॉस !

bossजैसे कि हर मीटिंग के बाद होता है, बाहर निकल कर लोगों ने अपने चैनल को गाली दी। साथ ही अपने मन में पल रहे उस कीड़े को फिर से चारा डाला, जो रोज़ तुमसे ये कहता है कि...[पूरा पढ़ें]

अफेयर न होने का अफसोस

affairइन लड़कियों को ग्लैमर में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी या फिर वैसा कभी मौका नहीं मिला। इसलिए बॉस के बारे में वही राय रखती जो कि हम सब गुपचुप तरीके से रखते थे। हममें से ज्यादातर लोग चों-चों करने वाले कपल को गरियाते। जाकर पूछते,चलोगी लंच करने और हममे से ही कोई...[पूरा पढ़ें]

एक्सक्लूसिव और ब्रेकिंग के बीच तड़पतीं खबरें

sanjayअपराध, सेक्स, मनोरंजन से जुड़ी खबरें मीडिया की आजमायी हुई सफलता का फंडा है। हमारी नैसर्गिक विकृतियों का प्रतिनिधित्व करने वाली खबरें खबरिया चैनलों पर अगर ज्यादा जगह पाती हैं तो यह पूरा का पूरा मामला...[पूरा पढ़ें]


ब्रेक स‌े पहले

धनुष ब्रेक की ब्रेकिंग न्यूज

डाकू का 'एक्स‌क्लूसिव' स‌रेंडर

ब्रेकिंग न्यूज की मजबूरी क्यों? 

मुजरिम की मुस्कान और मीडिया

स‌ब कुछ तय करने की चैनलाई रस्साकशी

एक जांबाज पत्रकार का यूं चले जाना...

राजेंद्र अवस्थी: काल चिंतन के चितेरे

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