'झुठ' या झूठ का सच
-नलिनी तिवारी राजपूत
रण फिल्म रिलीज होने और देखने के बाद, अब समझ आ रहा है कि मुंबई हमले के फौरन बाद रामगोपाल वर्मा, रितेश देशमुख के साथ ताज होटल क्यों पहुंच गए थे। उस वक्त काफी बवाल हुआ था। रितेश के पिता और महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री, विलासराव देशमुख को भी इस 'विजिट' के लिए दंश झेलना पड़ा था। उस वक्त ये बात साफ नहीं हो पाई थी कि रामू का वहां क्या काम ? लेकिन रण देखकर सब साफ हो गया। कल रण देखने का मौका मिला। रण फिल्म का चस्का इस वजह से ज्यादा था क्योंकि ये फिल्म न्यूज चैनल की वर्किंग को लेकर बनी थी। फिल्म के प्रमोशन में अमिताभ बच्चन और रामगोपाल वर्मा तमाम न्यूज चैनल्स में घूमे भी थे। लेकिन हैरानी की बात ये है कि रामू ने पिक्चर बनने के बाद ही क्यों न्यूज रूम का दौरा किया... अगर पहले करते तो शायद फिल्म और भी बेहतर बन सकती थी। कम से कम फिल्म में इंडिया-24 पर चलने वाली ब्रेकिंग न्यूज और टिकर के लिखने में तो गलतियां नहीं होती--जैसे, झुठ, अतूल, फिसदी...अब तो आप को समझ आ ही गया होगा ना कि ब्लॉग के टाईटल में झूठ को 'झुठ' क्यों लिखा है। लेकिन फिल्म में कई ऐसी बातें है जो वाकई न्यूज चैनल्स में होती हैं...[पूरा पढ़ें]
ब्लॉगिंग का मतलब सिर्फ अमिताभ बच्चन नहीं
दागदार दिखा '09 में मीडिया का दामन
चलो एक साल और गुजर गया। हमारे सारे ही साथियों ने, जाते साल की परछाई में झांकने की मीडिया में सालों से चलती आ रही परंपरा को निभाया। कई सारे दोस्तों ने अपने चैनल पर दिखाने के लिए साल भर की घटनाओं पर आधे - आधे घंटे के कई प्रोग्राम बनाए। तो कुछ ने पूरे साल भर की घटनाओं को कुछ स्पेशल पैकेज में निपटाया। कई भाई लोगों ने अपने अखबारों के लिए फुल पेज के कई सारे स्पेशल फीचर तैयार किए। लेकिन अपनी नजर में किसी ने भी खुद के भीतर झांकने की कोशिश नहीं की। हम मीडिया वालों की सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि दुनिया को हम आईना देखने की सलाह देते रहेंगे। लेकिन खुद शायद ही कभी आईने में अपना चेहरा देखेंगे। लेकिन अपन ने कोशिश की। अपना मीडिया वाला चेहरा आइने में देखा। और, जब देख ही लिया, तो यह आपको यह बताने में कोई हर्ज नहीं है हुजूर, कि सन 2009 का अपने मीडिया का चेहरा बहुत दागदार दिखा। इतना दागदार, कि इससे पहले भारतीय मीडिया कभी, किसी को भी इतना बदसूरत नजर नहीं आया होगा। [पूरा पढ़ें]
हिंदुत्व के लिए अब कैसी 'जनक्रांति' करेंगे कल्याण?
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी से तीन बार निष्कासित किए गए वरिष्ठ नेता कल्याण सिंह ने नई पार्टी बनाई है। उनकी नई पार्टी का नाम है जनक्रांति पार्टी। कल्याण ने अपने बेटे राजबीर सिंह को इसका अध्यक्ष बनाया है। हैरतअंगेज बात तो ये है कि कल्याण की इस पार्टी का मुख्य एजेंडा हिंदुत्व रखा गया है। ठोस हिंदुत्व। मतलब ये कि अभी भी हिदुत्व के घोड़े पर सवार होकर सत्ता की मलाई डकारने के ख्वाब संजो रहे हैं कल्याण सिंह। यानि लौट के लल्लू घर को आए। लेकिन जिस घर पर लौटे उस घर के दरवाज़े तो बंद हैं। खूब खटखटाया मगर खुले नहीं। वो घर है बीजेपी का। 5 जनवरी, 2010 को लखनऊ में अपनी नई पार्टी का ऐलान करते हुए कल्याण सिंह काफी आहत, चोटिल और बदला लेने पर आमादा नज़र आए। उनके हाव-भाव ऐसे थे कि मानों संकेत देना चाहते हों कि वो हर उस इंसान को गलत साबित करने जा रहे हैं जिसने उन पर भरोसा नहीं किया। [पूरा पढ़ें]
...तब गुरूजी जी पर ही इल्जाम क्यों?
आखिरकार गुरूजी का झारखण्ड का मुख्यमंत्री बनने का सपना साकार हो ही गया। भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से गुरूजी तीसरी बार और मुकम्मल तौर पर पहली बार झारखण्ड के मुख्यमंत्री बने हैं। हालांकि भाजपा के सामने समस्या यह थी कि वह उन गुरूजी को कैसे समर्थन दे दे जिनके ऊपर वह कुल जमा चार रोज पहले ही भ्रष्टाचारके आरोप लगा रही थी और उसने गुरूजी को केन्द्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया था। कई दिन संसद नहीं चलने दी थी। हालांकि भाजपा ने मन मसोसकर और कलेजे पर पत्थर रखकर गुरूजी को समर्थन दिया है, क्योंकि इसके अलावा न भजपा के पास कोई विकल्प था और न गुरू जी के सामने अपनी जिद पूरी करने के लिए कोई अन्य विकल्प बचा था। भाजपा की मजबूरी यह थी कि वह जानती थी कि अगर...[पूरा पढ़ें]
मुजरिम की मुस्कान और मीडिया
पुलिस के आला अधिकारी ने पूरे पुलिसिया तंत्र का ग़लत इस्तेमाल करते हुए अपने पाप पर पर्दा डालने की कोशिश की। लोकतंत्र के तीन स्तंभ विधायिका न्याय पालिका, और कार्यपालिका का ‘इस्तेमाल’ कैसे करना है वो बख़ूबी जानता था और चौथा स्तंभ पत्रकारिता उस वक्त इतना सक्रिय नहीं था जितना आज है। ऐसा नहीं है कि 1990 में देश में पत्रकारिता नहीं होती थी लेकिन जिस तरह से इसे एक मुहिम का रंग दिया गया है और आम आदमी की संवेदनाएं रुचिका के टूट चुके परिवार के साथ जुड़ी हैं वो बात उस वक़्त के मीडिया में नहीं थी। क्या ख़ास है आज के मीडिया में साहब? ख़ास है वो तस्वीरें जो बार बार आम आदमी से सवाल करती है की क्या लोकतंत्र उसके लिए है; या उसके लिए जो सज़ा मिलने के बावजूद मु्स्कुराता हुआ अदालत से बाहर निकलता है। ये मुजरिम जानता है की अपने रसूख और क़ानून की तकनीकी पेचीदगियों को समझने की इसकी क्षमता की वजह से ये सस्ते में निपट गया। लेकिन आज के मी़डिया की ख़ासतौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ये ख़ासियत है कि वो आम आदमी को उसकी बेचारगी का एहसास कराता है। जब भी इस सज़ायाफ्ता मुजरिम की कुटिल मुस्कान स्क्रीन पर आती है वो सीने तीर सी घुसती है। [पूरा पढ़ें]
एक जांबाज पत्रकार का यूं चले जाना...
राजेंद्र अवस्थी: काल चिंतन के चितेरे
सब कुछ तय करने की 'चैनलाई' रस्साकसी
बाजार की माया और मार इतनी गहरी है कि वह अपनी चकाचौंध में सबको लपेट चुकी है। उसके खिलाफ हवा में लाठियां जरूर भांजी जा रही हैं, लेकिन लाठियां भांज रहे लोग भी इसे बेकार की कवायद मानने लगे हैं। टीवी चैलनों पर मचा धमाल इससे अलग नहीं है।देश में सैकड़ों चैनल रात-दिन कुछ न कुछ उगलते रहते हैं। इन विदेशी-देशी चैनलों का आपसी युद्ध चरम पर है।ज्यादा से ज्यादा बाजार,विज्ञापन एवं दर्शक कैसे खींचे जाएं सारा जोर इसी पर है। जाहिर है इस प्रतिस्पर्धा में मूल्य, नैतिकता एवं शील की बातें बेमानी हो चुकी हैं। होड़ नंगेपन की है। बेहूदा प्रस्तुतियों की है। जैसे-तैसे दर्शकों को बांधे रखने की है। टीवी चैनलों पर चल रहे धारावाहिकों में ज्यादातर प्रेम-प्रसंगों, किसी को पाने-छोड़ने की रस्साकसी एवं विवाहेतर संबंधों के ही इर्द-गिर्द नाचते रहते हैं। वे सिर्फ हंसी-मजाक नहीं करते, वे माता-पिता के साथ परिवार व बच्चों के बदलते व्यवहार की बानगी भी पेश करते हैं। अक्सर धारावाहिकों में बच्चे जिस भाषा में अपने माता-पिता से पेश आते हैं, वह आश्चर्यचकित करता है। [पूरा पढ़ें]
अंबिका सोनी को चलता करना चाहते हैं चैनलों के संपादक
मठाधीशों की धांधलियों का अड्डा अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय
'तुम्हारा रेप करा देंगे किसी को पता भी नहीं चलेगा'
कथादेश के संपादक हरिनारायण को बृजलाल द्विवेदी सम्मान
बिलासपुर। पंडित बृजलाल द्विवेदी स्मृति अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान समारोह 7 फरवरी, 2010 को लायंस भवन, लिंकरोड, बिलासपुर (छत्तीसगढ़) में आयोजित किया जाएगा। इस सम्मान के लिए इस बार दिल्ली से प्रकशित साहित्यिक पत्रिका ‘कथादेश’ के संपादक हरिनारायण को चुना गया है। साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में दिये जाने वाले इस सम्मान में किसी साहित्यिक पत्रिका का श्रेष्ठ संपादन करने वाले संपादक को 11 हज़ार रुपये, शाल, श्रीफल एवं प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया जाता है। इससे पहले यह सम्मान ‘वीणा’ (इंदौर) के यशस्वी संपादक डॉ. श्यामसुंदर व्यास और ‘दस्तावेज’ (गोरखपुर) के संपादक डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को दिया जा चुका है। मार्च 1948 में जन्मे हरिनारायण 1980 से साहित्यिक पत्रिका कथादेश का संपादन कर रहे हैं। वे हंस, विकासशील भारत, रूपकंचन के संपादन से भी जुड़े रहे हैं। बिलासपुर में सात फरवरी को आयोजित समारोह के मुख्य अतिथि प्रख्यात कवि एवं उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल होंगे। समारोह में प्रख्यात कथाकार ऋषिकेश सुलभ, बख्शी सृजन पीठ, भिलाई के अध्यक्ष बबन प्रसाद मिश्र, छत्तीसगढ़ हिंदी ग्रंथ अकादमी, रायपुर के निदेशक रमेश नैयर, साहित्य अकादमी, दिल्ली के सदस्य गिरीश पंकज, प्रख्यात कवि-कथाकार जया जादवानी, हरिभूमि, रायपुर के प्रबंध संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी और माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष पुष्पेंद्र पाल सिंह मौजूद रहेंगे। समारोह की अध्यक्षता छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के अध्यक्ष श्यामलाल चतुर्वेदी करेंगे। सम्मान के लिए हरिनारायण का चयन पांच सदस्यीय निर्णायक मंडल ने किया, जिसमें नवनीत के संपादक विश्वनाथ सचदेव, सप्रे संग्रहालय, भोपाल के संस्थापक विजय दत्त श्रीधर, छत्तीसगढ़ हिन्दी ग्रंथ अकादमी के संचालक रमेश नैयर, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर के कुलपति सच्चिदानंद जोशी और साहित्य अकादमी के सदस्य गिरीश पंकज शामिल थे।
पत्रकार हिमांशु द्विवेदी को ‘डाक्टरेट’
की उपाधि
रायपुर। हरिभूमि समाचार पत्र समूह के प्रबंध संपादकहिमांशु द्विवेदी को माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय ने पीएचडी की उपाधि प्रदान की है। कला में स्नातक एवं पत्रकारिता में स्नातकोत्तर हिमांशु को यह उपाधि ‘वैश्वीकरण और बाजारवाद की चुनौतियों के संदर्भ में हिन्दी पत्रकारिता का आलोचनात्मक अध्ययन’ विषय पर शोध के लिए दी गई है। हिमांशु द्विवेदी ने वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव एवं शिक्षाविद् डॉ. श्रीकांत सिंह के मार्गदर्शन में पीएचडी पूरी की है। डाक्टरेट की उपाधि मिलने पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल, शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल, नगरीय निकाय मंत्री राजेश मूणत, प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष सत्य नारायण शर्मा, विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष प्रेम प्रकाश पांडे, छत्तीसगढ़ क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष बलदेव सिंह भाटिया सहित साहित्य व पत्रकारिता जगत से जुड़े अनेक लोगों ने उन्हें बधाई दी है।
पत्रकारिता विवि के कुलाधिसचिव को भावभीनी विदाई
भोपाल। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के पूर्व कुलाधिसचिव (रेक्टर) ओपी दुबे को विश्वविद्यालय केप्राध्यापकों और कर्मचारियों ने भावभीनी विदाई दी। प्रेस काम्पलेक्स स्थित विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित समारोह में वक्ताओं ने ओपी दुबे के कार्यकाल को बेहतरीन बताते हुए उनके सुखद भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं। कम्प्यूटर विभाग के अध्यक्ष प्रो. चैतन्य पुरूषोत्तम अग्रवाल ने शाल-श्रीफल और पुस्तकें भेंटकर उन्हेंसम्मानित किया।विश्वविद्यालय की शोध परियोजना के निदेशक विजयदत्त श्रीधर ने इस अवसर पर कहा कि ओपीदुबे की उपस्थिति परिसर में एक नैतिक सत्ता की तरह थी। उन्होंने उम्मीद जतायी कि आने वाले अधिकारी भी इस सिलसिले को आगे बढ़ाएंगे। इलेक्ट्रानिक मीडिया विभाग के अध्यक्ष डॉ.श्रीकांत सिंह का कहना था कि ओपीदुबे के कार्यकाल में विश्वविद्यालय को विशिष्ट पहचान मिली। कार्यक्रम के आखिर में ओपी दुबे ने सबका आभार प्रकट किया।इस मौके कार्यकारी रेक्टर जे.आर झणाणे, कुलसचिव प्रकाश साकल्ले, प्रो. चैतन्य पुरूषोत्तम अग्रवाल, डॉ. पवित्र श्रीवास्तव, डॉ. अनुराग सीठा, तॉ. अविनाश वाजपेयी, राखी तिवारी, डॉ. रंजन सिंह, डॉ. महावीर सिंह, केसी मौली, डॉ. मोनिका वर्मा, मीता उज्जैन, सुनीता द्विवेदी, मनीष माहेश्वरी, पी.शशिकला, संजीव गुप्ता, गरिमा पटेल आदि मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने किया।
पत्रकार श्यामलाल यादव को आरटीआई अवार्ड
दिल्ली। हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार श्याम लाल यादव को सूचना अधिकार कानून का इस्तेमाल कर बेहतरीन रिपोर्टिंग करने के लिए आरटीआई अवार्ड देने की घोषणा की गई है। उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी 1 दिसंबर को उन्हें पुरस्कृत करेंगे। इस अवार्ड के साथ एक लाख रुपये नकद और प्रशस्ति पत्र दिया जाएगा। श्यामलाल यादव राष्ट्रपति ऑफिस, सचिवालय, पीएमओ आदि में 1700 आरटीआई आवेदन दायर कर चुके हैं। श्यामलाल यादव उन पत्रकारों में हैं जिन्होंने भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से शुरुआती दौर में पत्रकारिता की पढ़ाई की है। कई प्रमुख अखबारों में काम कर चुके श्यामलाल यादव इस वक्त टीवी टुडे ग्रुप की हिंदी पत्रिका इंडिया टुडे में प्रिंसिपल करेसपांडेंट हैं। इससे पहले वह अमर उजाला में बतौर संवाददाता कार्यरत थे।
चंडीगढ़ भास्कर से दो लोग पहुंचे अमर उजाला
चंडीगढ़। दैनिक भास्कर चंडीगढ़ से दो लोगों के अमर उजाला चंडीगढ़ का रुख करने की खबर है। पिछले आठ साल से भास्कर में काम कर रहे सब एडीटर अरविंद धवन ने अब अमर उजाला को अपना नया ठिकाना बना लिया है। वहीं चंडीगढ़ से दैनिक भास्कर के लिए सीबीआई कवर करने वाले आशीष तिवारी ने भी अमर उजाला का दामन थाम लिया है। आशीष इससे पहले भी अमर उजाला से ही दैनिक भास्कर आए थे। चंडीगढ़ भास्करसे और भी तीन चार लोगअगले महीने लांच होने वाले दैनिक आज समाज ज्वाइन करने वाले हैं। बताया जा रहा है किएक-दो लोगों को तो ऑफर लेटर भी मिल चुका है।
उम्मीदें हैं तभी तो आलोचना है
आजकल मीडिया की आलोचना बढ़ गई है। मीडिया को बार-बार उसके सरोकार और दायित्वबोध की याद दिलायी जा रही है। यह सब हैरत में डालने वाला है। यहां तक कि कभी पुलिस, नेता और पाकिस्तान से आगे न जाने वाली मंचीय कवियों के निशाने पर भी मीडिया है। असल में यह मीडिया की बढ़ती ताकत का ही सबूत है। यह साबित करता है कि मीडिया से लोगों की अपेक्षाएं बहुत बढ़ गयी हैं। इसी वजह से बाकी स्तंभों से ज्यादा याद मीडिया की होती है। आज हर तरफ से मायूस लोग हर बीमारी को मीडिया ताकत से दूर करना चाहते हैं। पहले सभी दरवाजों से निराश आदमी अखबार से दफ्तर में आता था। आज वह सबसे पहले अखबार या न्यूज चैनल के दफ्तर में पहुंचकर इंसाफ मांगता है। स्टिंग आपरेशन और भ्रष्टाचार कथाओं तक पत्रकारों की पहुंच खोज से कम, जनता के सहयोग से...[पूरा पढ़ें]
भारत में बेलगाम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के इस दौर में प्रायोजित रियलिटी शो के नाम पर जो कुछ परोसा जा रहा है, उसे देखकर लगता है कि केंद्र सरकार गांधी जी के तीन बंदरों की शिक्षा पर सौ फीसदी अमल कर रही है। उसने तय कर लिया है कि टीवी पर परोसे जा रहे कार्यक्रमों के बारे में वह न कुछ बोलेगी, न देखेगी और न ही सुनेगी। ये कार्यक्रम संवेदनशील भारतीयों को बेचैन-हैरान कर रहे हैं। वर्जनाओं को तोड़ रहे हैं। ये उन भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं को ध्वस्त कर रहे हैं जिनके प्रति पश्चिमी देशों में भी सम्मान था। औद्योगिक घरानों के लिए 'सोने का अंडा देने वाली मुर्गी' बने इस टीवी ने विज्ञापन जुटाने की होड़ में ऐसे चौंकाने वाले कार्यक्रम परोसने शुरू कर दिए हैं जो हमारी मान्यताओं, विश्वासों और नैतिक वर्जनाओं की धज्जियां उड़ा रहे हैं। ये कार्यक्रम समाज में बीमारियां बांट रहे हैं...[पूरा पढ़ें]

रोकना ही होगा अखबारों के इस 'काले धंधे' को
जारी है अखबारों में 'मिलावट' के खिलाफ मुहिम
अब पानी सिर से ऊपर चला गया है
मत पीटिए मीडिया के 'प्रोफेशनल' होने का ढिंढोरा
खबर लहरिया को यूनेस्को सम्मान
मीडिया में नौकरी दिलाने वालों से सावधान
खबरें जाएं भाड़ में, मुनाफा तो मनोरंजन में है
पत्रकार बेचारा, काम के बोझ का मारा
पांच मंडल के पत्रकारों को मान्यता की हरी झंडी
अब न्यूज चैनल की 'दुकान' खोलना आसान नहीं
क्यों नहीं कर पाए सच का सामना?
दोबारा शुरू हुआ एग्रीग्रेटर ब्लॉगवाणी
कामयाबी उम्मीदें बढ़ाती है: विजेंद्र
मैडम फिजा कुछ तो तमीज सीखिए...
शर्मसार करता एक 'जनवादी' अखबार
भगवा ओढ़ने को बेकरार पीली छतरी वाले
जी की जय, बाकी चैनलों के लिए मंदी बनी शोषण का हथियार
दिनामलार के संपादक को जमानतअखबारों को ये क्या होता जा रहा है?
'हम न तो कोई जवाब देंगे और न ही उन्हें गालियां देंगे'अब हिंदी में होगा डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू...
हिंदी ब्लॉग जगत को तोहफा, नया एग्रीग्रेटर 'ब्लॉग प्रहरी' लांच
नहीं रहे खबरों के शिल्पकार डॉ. रामकष्ण पांडेय
आर्थिक पत्रकारिता: बढ़ रही है 'अर्थ' की अहमियत
वीओआई शुरू, च्वाइस ऑफ इंडिया बनने की चाहत
हर चैनल की एक तमन्ना दिखना और बिकना है

एक चैनल को जरूरत है मरने वाले की
'जरूरत है एक ऐसे व्यक्ति की, जो जानता हो कि उसे टर्मिनल इलनेस (लाइलाज बीमारी, जिससे मौत सुनिश्चित हो) है। उस पर हम ममी बनाने की मिस्त्र की प्राचीन तकनीक का इस्तेमाल करना चाहते हैं।' ऐसा ही एक विज्ञापन इन दिनों ब्रिटेन के लोकप्रिय चैनल-4 और फैल्क्रम टीवी ने कई अखबारों और पत्रिकाओं में दिया है। दरअसल, चैनल-4 ममी बनाने की प्रक्रिया की लाइव डॉक्युमेंटरी बनाना चाहता है। लंदन के दैनिक टेलीग्राफ ने खबर दी हैकि चैनल एक ब्रिटिश वैज्ञानिक के साथ मिलकर इस काम को अंजाम देना चाहता है। इस वैज्ञानिक का दावा है कि...[पूरा पढ़ें]
बेशर्मों की ब्रेकिंग न्यूज

सर आम जनता बहुत ही उतेजित और रोमांचित है लेकिन हालात अभी नियंत्रण में हैं। मैंने भीड़ की राय जानने की कोशिश की है। खैर मैं इस बारे में बाद में बताऊंगा पहले पूरी घटना विस्तार से बताता हूं। जैसा कि आप देख रहे हैं, अभी वे बदमाश जो नशे में धुत हैं, उस लड़की के कपडे फाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। रही बात पुलिस की तो यहां से निकटतम पुलिस थाना महज़ एक किलोमीटर पर स्थित है लेकिन पुलिस अभी भी यहां नहीं पहुंची है। आपको क्या लगता है कि उस लड़की के साथ बलात्कार होने की कोई संभावना है...[पूरा पढ़ें]
टीवी को खारिज कर पाना नामुमकिन
क्या टेलीविजन पत्रकारिता से सरोकार गायब हो गए हैं। क्या टेलीविजिन बुद्धू बक्से से आगे नहीं बढ़ पाया। क्या ये सच्चाई है। जब इस सवाल पर दिमाग पर थोड़ा जोर डालता हूं तो...[पूरा पढ़ें]
सेब बेचने वाली एंकर, आलू बेचने वाला रिपोर्टर
सेब बेच रही टीवी एंकर से सेब खरीद कर आगे बढ़ गया। उत्पात मचा रहे एक सांड़ से बचने के लिये मैं तेजी से पैर बढ़ा रहा था कि पीछे से आती आवाज को सुनकर पैरों में ब्रेक लग गए...[पूरा पढ़ें]
न्यूज चैनल का प्रोड्यूसर
बॉस को देखते ही वह बहुत व्यस्त हो जाता है। कभी फोन पर चीखता है। कभी जूनियर्स पर चिल्लाता है। कभी सिस्टम पर गुस्सा उतारता है। एक्टिव इस कदर है कि कई बार तो... [पूरा पढ़ें]
बिहारी हो तो मीडिया में नौकरी पक्की!
ज्यादा बनो मत, स्साले बिहारी, तुम लोगों को तो बुलाकर नौकरी दी जाएगी। इसी लाइन को सुन-सुनकर कुछेक साउथ इंडियन क्लासमेट स्साले बिहारी बोलना सीख गयी थी और हम उन पर फिदा हो जाते...[पूरा पढ़ें]
न्यूज चैनल के लिए चाहिए
आवेदक के अपराधियों से लेकर पुलिसवालों से अच्छे संबंध होने चाहिए। अगर आवेदक खुद ब्लैकमैलिंग, चोरी, लूट बलात्कार जैसे अपराध में जेल जा चुका है या...[पूरा पढ़ें]
मीडिया का शार्ट कट
लड़की कुछ अधिक समझदार थी। दिल्ली के राष्ट्रीय चैनल में तरक्की पर तरक्की पाए जा रही थी। मीडिया में चर्चा थी। वह आजकल मिस्टर झा की खास हैं। देखते देखते वह चाय की दुकान से लेकर...[पूरा पढ़ें]
संपादक के नाम पत्र
मैंने अपनी कई रचनायें भी आपको प्रकाशनार्थ भेजी थीं, लेकिन पता नहीं क्यों वो प्रकाशित नहीं हुईं। जरूर वो आप जैसे विद्वान की आंखों के सामने से नहीं गुजर सकी होंगी। मैं बचपन से ही...[पूरा पढ़ें]
मेरे पास तो कोई प्लान नहीं है बॉस !
जैसे कि हर मीटिंग के बाद होता है, बाहर निकल कर लोगों ने अपने चैनल को गाली दी। साथ ही अपने मन में पल रहे उस कीड़े को फिर से चारा डाला, जो रोज़ तुमसे ये कहता है कि...[पूरा पढ़ें]
अफेयर न होने का अफसोस
इन लड़कियों को ग्लैमर में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी या फिर वैसा कभी मौका नहीं मिला। इसलिए बॉस के बारे में वही राय रखती जो कि हम सब गुपचुप तरीके से रखते थे। हममें से ज्यादातर लोग चों-चों करने वाले कपल को गरियाते। जाकर पूछते,चलोगी लंच करने और हममे से ही कोई...[पूरा पढ़ें]
एक्सक्लूसिव और ब्रेकिंग के बीच तड़पतीं खबरें
अपराध, सेक्स, मनोरंजन से जुड़ी खबरें मीडिया की आजमायी हुई सफलता का फंडा है। हमारी नैसर्गिक विकृतियों का प्रतिनिधित्व करने वाली खबरें खबरिया चैनलों पर अगर ज्यादा जगह पाती हैं तो यह पूरा का पूरा मामला...[पूरा पढ़ें]
डाकू का 'एक्सक्लूसिव' सरेंडर
ब्रेकिंग न्यूज की मजबूरी क्यों?