अभी मत पीटिए हिंदी मीडिया के प्रोफेशनल होने का ढिंढोरा
भारतीय मीडिया इंडस्ट्री प्रोफेशनल होने और कारपोरेट कल्चर अपनाने का दावा तो करती है। लेकिन भारत में यह सब मालिकों के हितों तक ही सीमित है। जहां भी पत्रकारों के हितों की बात आती है, भारतीय मीडिया हाउस उनका शोषण करते ही नजर आते हैं। यह हालत तकरीबन सभी मीडिया हाउसों की है। नई दुनिया के वरिष्ठ उप संपादक सचिन शर्मा इसी मुद्दे पर अपनी बात रख रहे हैं। सचिन के इस आलेख को हमने उनके ब्लॉग सचिन की दुनिया से साभार लिया है। पेश है उनके लेख का संपादित अंश।
एक दिन देश के बड़े हिन्दी अखबारों में से एक दैनिक भास्कर के डॉयरेक्टर (मार्केटिंग) गिरीश अग्रवाल की बात पढ़ रहा था। उनका कहना था कि देश में बहुत से पत्र-पत्रिकाए आ रहे हैं इसका मीडिया जगत को जबरदस्त फायदा मिलेगा। कुछ दिन पहले ही देश का प्रतिष्ठित अखबार समूह बेनेट एंड कोलमेन ने इकॉनोमिक टाइम्स का हिन्दी संस्करण निकाला। बिजनेस स्टैंडर्ड भी हिन्दी में शुरू हुआ। लेकिन इस सब के बाद भी मन में कुछ कमी खटकती है। नौ साल से सुन रहा हूं कि ये अखबार शुरू हो रहा है वो अखबार शुरू हो रहा है, हम सबको इसका फायदा मिलेगा लेकिन मेरा अनुभव आईआईएम के छात्रों सरीखा है। आईआईएम के छात्र मोटे वेतन पर नौकरियों पर लगते हैं। जब इन छात्रों की नौकरियां लगती हैं तो अखबारों में खूब चर्चे होते हैं। लेकिन इन्हीं छात्रों में से 3 से 6 महीने के बाद कई को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ता है। वे अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाते। यानी सिर्फ किताबी ज्ञान और ट्रेनिंग ही सब कुछ नहीं। कंपनियां व्यावहारिक ज्ञान और अनुभव के पैमाने पर उन्हें कई बार कमजोर मान लेती हैं।
ठीक ऐसा ही अखबार जगत में भी है। दिल्ली में ढेरों अखबार हैं लेकिन अमर उजाला दक्षिण दिल्ली में नहीं दिखता तो जागरण पूर्वी दिल्ली में कम है। राष्ट्रीय सहारा कहीं दिखता है तो कहीं नहीं। नवभारत टाइम्स और दैनिक हिन्दुस्तान सही हालत में है लेकिन अपने अंग्रेजी वर्जन हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स आफ इंडिया से कोसों पीछे हैं। ज्यादातर अखबार आज भी पत्रकारों को रुपये देना नहीं चाहते। जहा आईटी सेक्टर या मैनेजमेंट में लोग शुरुआत करते ही 30 हजार रुपये महीना कमाने लगते हैं वहीं अखबारों में यह वेतन आज भी स्थानीय संपादकों के स्तर पर मिलता है। जो बच्चे इस फील्ज में आ रहे हैं वे आकर्षक वेतन पैकेज की वजह से नहीं ग्लैमर देखकर आ रहे हैं। ग्लैमर का यह भूत उनके सिर से जल्दी ही उतर जाता है।
देश में बड़े हिन्दी अखबार के ग्रुप लगभग दस हैं। मतलब हमारे पास आप्शन भी इतने ही हुए। वहीं दूसरे सेक्टर्स में कंपनियों की संख्या कई हजार में है। वह भी बड़े साइज की कंपनियों की। कोई आईटी इंजीनियर या मैनेजर कई जगह नौकरी कर सकता है। लेकिन पत्रकार सिर्फ अखबार में ही काम कर सकता है। भले ही वह दबाया-कुचला जाता हो, फिर भी जमा रहता है। कहा जाएगा? मैं जिन अखबारों की बात कर रहा हूं वे देश के किसी एक ही राज्य में हों ऐसा नहीं है। भास्कर देश के कुछ राज्यों में है लगभग सात। नई दुनिया मप्र में है। लोकमत महाराष्ट्र में है। पंजाब केसरी और ट्रिब्यून पंजाब और हरियाणा में हैं। अमर उजाला, जागरण उत्तर प्रदेश बेस्ड हैं और ये भी एकाधिक राज्यों (छह से सात) में हैं। इसका मतलब अगर आपको रिस्क लेना है तो कई राज्यों में दौड़ लगाना पड़ सकता है। कुछ लोग यह दौड़ लगा लेते हैं तो कुछ हार जाते हैं। इन्हीं रुकने वाले लोगों के बल पर कई अखबार अपने पत्रकारों का शोषण करते हैं। एक बार आप इसका शिकार हुए नहीं कि सारे दबाव आपके ऊपर आने लगते हैं, जिनका सामना करते-करते आप पत्रकार कम और मजदूर अधिक हो जाते हैं।
दरअसल दुनिया में मीडिया इंडस्ट्री की शक्ल भी वाकई इंडस्ट्री जैसी ही है। सिर्फ नाम की नहीं है जैसी कि भारत में है। विदेशों में अखबारों की बातें कुछ अलग ही हैं। न्यूयार्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट की तो बात ही छोड़ें, तीस-तीस मंजिला इमारतें हैं। एक बीट संभालने वाले ही तीन-तीन सौ रिपोर्टर होते हैं। संसार भर में घूमते हैं। वहां प्रिंटिंग और पब्लिशिंग इंडस्ट्री लीजेंड हैं। अमेरिका में ही नहीं, बल्कि पूरे योरोप में रायटर्स, ला मोंद, बीबीसी, एपी, एएफपी न्यूज और फोटो एजेंसियों का साइज ही इतना बड़ा है कि कोई इंडस्ट्री वाकई छोटी पड़ जाए। संसार भर में संवाददाता और फोटोग्राफर तैनात हैं। वहीं भारत डेढ़ सौ साल पुरानी पत्रकारिता होने के बावजूद फिलहाल कंजरवेटिव है। इस पत्रकारिता का फायदा अखबारों के मालिकों को अधिक और पत्रकारों को कम नसीब हुआ है। पत्रकारों का सही इस्तेमाल करने में हमेशा कंजूसी ही रही। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पत्रकारों को एक्सपोजर और रुपया दिया लेकिन वहां काम करने वालों की संख्या बहुत कम होती है। अगर किसी अखबार के एक बड़े एडीशन में 1500 लोग काम करते हैं तो किसी न्यूज चैनल में यह संख्या भारत भर के सारे दफ्तरों को मिलाकर हो जाती है। कुल मिलाकर अभी लंबी दौड़ लगानी है। लंबा रास्ता तय करना है। इंडस्ट्री बनने में खासकर हिन्दी मीडिया को अभी वक्त है। कम से कम व्यावसायिकता आने में तो अभी वक्त है ही। तब तक पत्रकारों को थोड़ा और इंतजार करना पड़ेगा। शायद अच्छा वक्त जल्दी ही आए।
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