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  • दिल्ली में ब्लॉगर मीट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की स‌मझ का दायरा
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    Vब्लॉगिंग का मतलब सिर्फ अमिताभ बच्चन नहीं

    -विनीत कुमार 

    पहले तो मन में आया कि इस पोस्ट का शीर्षक दूं- आजतक चैनल में घुस आए हैं निकम्मे लोग। फिर बाद में लगा,ऐसा लिखना सही नहीं होगा। ये बात कोईआजतक चैनल की अकेले की नहीं है,कमोवेश सभी चैनलों में मामला एक सा ही है। दूसरी बात कि इस शीर्षक के तहत बात करने का मतलब है चैनल की दमभर खिंचाई करना और अपनी भड़ास निकालकर चुप मार जाना। मैं चैनल के इस एप्रोच पर भड़ास निकालने या चुप्पी मारने के बजाय उस मुद्दे तक आना चाहता हूं जहां चैनल के लिए ब्लॉगिंग का मतलब सिर्फ अमिताभ बच्चन है,शाहरुख के ब्लॉग की दुनिया में कूद पड़ने की खबर है,आमिर खान के अपने ब्लॉग के जरिए कॉन्ट्रवर्सी पैदा करना है।
    Bकुल मिलाकर ब्लॉगिंग सिलेब्रेटी और उस टाइप के लोगों के लिए अपने फैन,ताक लगाकर बैठी मीडिया और न्यूज डेस्क पर बाट जोह रहे चैनलकर्मियों के लिए कुछ टुकड़े और मसाले फेंक देने की जगह है। एक ऐसी जगह जहां से देश का बड़ा से बड़ा अखबार उन टुकड़ों को उठाकर पूरे आधे पन्ने की खबर छाप सके,न्यूज चैनल आधे घंटे की स्पेशल स्टोरी बना सके। उस पर दुनियाभर के एक्सपर्ट के फोनो और चैट लिए जा सकें। यानी बिना हर्रे और फिटकरी लगाए सिलेब्रेटी चोखे तरीके से खबरों में टांग फैला दे। हिन्दी में करीब 12 हजार से भी ज्यादा हम जैसे लोग जो ब्लॉगिंग कर रहे हैं उन्हें समझना होगा कि ब्लॉग को लेकर जो नजरिया और समझ विकसित की जा रही है वो ब्लॉग की दुनिया के विस्तार के काम आएगा?

    इस बात को मानने में रत्तीभर भी दुविधा नहीं है कि जब से अमिताभ बच्चन ने ब्लॉगिंग की दुनिया में कदम रखा, मनोज वाजपेयी ने हिन्दी में ब्लॉगिंग शुरु की और शशि थरुर नेट्विटर के जरिए अपनी बात कहनी शुरु की तब से आमलोगों को भी इसके बारे में जानकारी मिलनी शुरु हुई। इन्टरनेट की दुनिया में इस पर लिखे जाने का मतलब समझने लगे। नहीं तो आम आदमी क्या यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर तक लंबे समय तक यही समझते रहे कि ब्लॉगिंग कोई चैटियाने जैसी चीज है। इनलोगों के आने और लिखे जाने से ब्लॉगिंग,ट्विटर, फेसबुक और सोशल साइटें तेजी से इस देश में पॉपुलर हुए। एक ब्लॉगर की हैसियत से हमें इन सबों का शुक्रिया अदा किया जाना चाहिए। आज गांव और कस्बों में जाने पर भी जब लोग हमारे बारे में बताते हैं कि ये ब्लॉगर हैं तो उन्हें मोटे तौर पर बात समझ आ जाती है कि हम क्या करते हैं? कई जगह हमें अमिताभ और मनोज वाजपेयी की परंपरा का जानकर पाइरेटेड सम्मान भी मिला है। बहरहाल,मुद्दा इसके आगे का है। मुद्दा ये है कि क्या सिलेब्रेटी और आम ब्लॉगरों के लिखे जाने में कोई फर्क नहीं है? दूसरी बात कि क्या सिलेब्रेटी और ब्लॉगिंग एक दूसरे के पर्याय हैं। इस मसले पर बात करना इसलिए भी जरुरी है कि एक आम आदमी इसे एक-दूसरे से घालमेल कर देता है तो बात समझ में आती है लेकिन देश का सबसे तेज कहलाए जानेवाला चैनल सहित बाकी मीडिया अगर ऐसा कहते है,ऐसा दिखाते-बताते हैं तो हमें गंभीरता से लेना होगा।

    सीएसडीएस सराय में जो ब्लॉगर्स मीट हुई दिल्ली आजतक ने उस पर 32 सेकण्ड की स्टोरी चलायी। इस 32 सेकण्ड में ऐसा कुछ भी नहीं था जो कि ये स्पष्ट करता हो कि इस मीट में क्या बातें हुई, इस तरह के ब्लॉगर जमा होकर किस तरह की बातें करते हैं? ऐसे आयोजनों का क्या मतलब है जबकि वो वर्चुअल स्पेस में पहले से मौजूद हैं? खबर में ये भी नहीं बताया कि इसका आयोजन कहां किया गया था,कितने लोग शामिल हुए? कुछ भी नहीं।अविनाश वाचस्पति के एसएमएस किए जाने पर(बाहर आएं,आजतक वाले बात करना चाहते हैं.) जब मैं बाहर निकलकर दिल्ली आजतक के रिपोर्टर को बाइट दे रहा था और जिस तरह से वो सवाल कर रहे थे उससे दो बातें साफ हो गयी- एक तो ये कि इस बंदे को ब्लॉगिंग के बारे में कुछ भी नहीं पता। पता भी है तो सिर्फ इतना कि इसका संबंध अमिताभ बच्चन और दूसरे सिलेब्रेटी से है और दूसरा कि इन्हें हमसे कुछ बेसिक जानकारी चाहिए जिसे कि वो एंकर शॉट बनाकर पेश कर देंगे। उन्होंने इस मसले पर रविकांत,अविनाश वाचस्पति और मुझसे कुछ सवाल किए। वही कि कितनी संख्या है,क्यों करते हैं,ब्ला ब्ला।

    कुछ गलती अपनी तरफ से भी थी कि 2 बजे से शुरु होने की बात करके भी ढाई बजे तक हिन्दी सॉफ्टवेयर पर प्रजेंटेशन चलता रहा। लेकिन वो तब तक मौजूद रहे और शुरु होने के कुछ देर बाद ही गए। इस बीच चाहते तो वहां से लोगों को बोलते हुए,एक-दूसरे को रिस्पांड करते हुए कुछ फुटेज ले सकते थे। लेकिन कुछ नहीं किया। बस बैठे रहे। उनके एटीट्यूड और बाद में खबर देखकर मेरे दिमाग में एक ही बात आ रही थी। इस स्टोरी को कवर करने में कम से कम दो हजार रुपये तो जरुर खर्च हुए होंगे। उपर से करीब तीन घंटे तक कैमरा यूनिट, गाड़ी, ड्राइवर, कैमरामैन और खुद रिपोर्टर फंसा रहा। इस बीच शहर की कोई इससे भी जरुरी स्टोरी कवर हो सकती थी। इन्होंने चैनल का पैसा पानी में बहाया। खबर देखकर हमें कहीं से नहीं लगा कि इस 32 सेकण्ड की स्टोरी के लिए इन्हें यहां तक आने की जरुरत थी। वो जो कि एक लाइन में इसके बारे में बताया,फोन से भी पूछ सकते थे। इस हिसाब से एक पूरा का पूरा एंगिल बनता है कि आप विश्लेषित करें कि कैसे खबरों को कवर करने के लिए लगाए संसाधनों का दुरुपयोग होता है जबकि खबरें इन्टरनेट के फुटेज,विजुअल्स और कंटेंट से चेपकर बनाए जाते हैं। पूरी खबर में वही बात कि किस-किसका ब्लॉग है? लगभग सारे शॉट्स अमिताभ बच्चन जैसी हस्तियों के और फिर वो जो कि लगे कि कुछ इन्टरनेट पर से जुड़ी खबर दिखायी जा रही है। 

    अमिताभ लिखते हैं, करते क्यों नहीं?

    शब्दों और सृजन की ताकत को अपार बताते हुए अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग पर लिखा है कि सृजक कभी इतिहास का हिस्सा नहीं बनता। यह बात अलग है कि सृजक अक्सर अपने जीवनकाल में सराहना से वंचित रह जाता है। अपने पिता हरिवंश राय बच्चन के संघर्ष के दिनों का जिक्र करते हुए लिखा है कि उन दिनों पिता को ट्यूशन से मात्र 25 रूपए प्रति माह की आमदनी के लिए मीलों दूर पैदल चलना पड़ता था। 25 रूपए यानी आज के दौर में करीब आधा डॉलर...और संघर्ष के उन दिनों में यह आधा डॉलर पूरे माह के लिए होता था। हरिवंश राय बच्चन ने अपने संघर्ष के दिनों की पीड़ा को शब्दों में बांध कर एकांत संगीत की रचना की। तब अमिताभ का जन्म नहीं हुआ था। अमिताभ बच्चन ने लिखा है मेरे पिता ने तब सोचा भी नहीं होगा कि शब्दों का रूप लेकर वह संघर्ष और पीड़ा हिन्दी के लाखों पाठकों के दिलोदिमाग में एक खास जगह बनाएंगी। उन्हें यह अहसास भी नहीं हुआ होगा कि इस रचना को रचते समय उनके जिस पुत्र का जन्म नहीं हुआ था, वह एक दिन इंटरनेट के जरिए उनके विचारों को अनगिनत पाठकों तक पहुंचाएगा। लेकिन यही शब्दों की ताकत है जो अपार है। उन्होंने लिखा है सृजन की शक्ति अपार है। लेकिन दुःख की बात यह है कि जीवनकाल में अक्सर सृजक को अपेक्षित सराहना नहीं मिलती। बहरहाल, सृजक कभी इतिहास का हिस्सा नहीं बनता। बेशक अमिताभ बच्चन बहुत अच्छा सोचते हैं और उतने ही बढ़िया तरीके से उसे अभिव्यक्त भी करते हैं, लेकिन दुःख इस बात का है कि वे खुद अपने लिखें हुए पर गौर क्यो नहीं करते। उनको कौन रोक रहाहै कि वे अपना ब्लॉग हिन्दी में नहीं लिखें, क्यों वे हिन्दी की कमाई खाते हुए भी अपनी बात कहने के लिए अंग्रेजी के गुलाम बने हुए हैं। अमिताभ बच्चन क्यों नहीं ऐसी पहल करते कि इस देश के सर्जकों को सामने लाकर उनको सम्मानित करे। क्या उनकी नजर में उनके पिता ने ही संघर्ष किया है। और उनके पिता के ही आदर्शों को मानते हुए भी उन्हें अपनी बात हिन्दी में लिखने और कहने से कोई परहेज नहीं करना चाहिए। [हिंदी मीडिया डॉट इन]


    सवाल ये है कि कैडवरी,रीड एंड टेलर,पार्कर और बोरोप्लस जैसे ब्रांड अमिताभ बच्चन और चैनल को उत्पाद बेचने के लिए पैसे देते हैं तो ये सब ऑडिएंस के आगे बेचा जाता है (विज्ञापन दिखाए जाने से कन्ज्यूमर बन जाने की प्रक्रिया) लेकिन हर खबर के साथ ऐसा किया जाना किस हद तक जायज है? मैं यहां तक मानने को तैयार हूं कि संभव है कि ब्लॉगिंग की दुनिया में ऐसे लोगों के आ जाने से कई लोगों ने उनसे इन्सपायर्ड होकर इन्टरनेट पर अपनी मन की बातें लिखनी शुरु कर दी हो। लेकिन अब जबकि हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में इसकी खुद की एक पहचान तेजी से बन रही है,दुनियाभर के मसलों पर कंटेंट हैं,लगातार लिखा-पढ़ा जा रहा है तो क्या जरुरी नहीं है कि चैनल सिलेब्रेटी की ओट लेकर खबरें दिखाना कम करे? चैनल के लोग जब स्पोर्ट्स,क्राइम,फैशन कवर करने जाते हैं तो कुछ होमवर्क करके जाते हैं। ऐसे में हिन्दी ब्लॉगिंग को कवर करने आए मीडियाकर्मी कुछ नहीं तो कम से कम दो-चार एग्रीगेटर और दस-पांच ब्लॉग तो देखकर आ सकते हैं।
    मैं महसूस करता हूं कि हिन्दी ब्लॉगिंग ने इतनी हैसियत बना ली है कि उस पर बिना सिलेब्रेटी से जोड़े या फिर उन्हें एकलाइन में शामिल करते हुए बाकी बातें इसके बनते-बदलते मिजाज पर की की जा सकती है और की जानी चाहिए। समाज,राजनीति,स्त्री-विमर्श,मीडिया विश्लेषण और हाशिए पर के समाज को लेकर जो कुछ लिखा जा रहा है उस पर बात की जाए। अब अभिव्यक्ति,अस्मिता,दबाव और संस्थानों के भीतर की घपलेबाजी को लेकर जो चीजें इसके जरिए सामने आ रही है उस पर बात होनी चाहिए। हिन्दी ब्लॉगिंग के लिए ये वो समय है जब इससे जुड़ी खबर को सिलेब्रेटी से जोड़कर और उन्हीं तक सीमित करके दिखाया जाता है तो इससे उसका नुकसान छोड़ फायदा नहीं। ऐसे में हम चाहेंगे कि मेनस्ट्रीम मीडिया इससे जुड़े कार्यक्रमों को न ही कवर करे तो बेहतर,कम से कम लोगों को इसके बारे में समझने में वक्त लगेगा लेकिन मीनिंग स्रिकिंग जैसी खतरनाक स्थति तो नहीं बनेगी।..फिर भी अगर फायदा है तो इस पर भी बहस हो।... (लेखक के ब्लॉग गाहे-बगाहे स‌े स‌ाभार )

रोकना ही होगा अखबारों के इस 'काले धंधे' को 

जारी है अखबारों में 'मिलावट' के खिलाफ मुहिम

अब पानी स‌िर स‌े ऊपर चला गया है

मत पीटिए मीडिया के 'प्रोफेशनल' होने का ढिंढोरा

खबर लहरिया को यूनेस्को स‌म्मान

मीडिया में नौकरी दिलाने वालों स‌े स‌ावधान

खबरें जाएं भाड़ में, मुनाफा तो मनोरंजन में है

पत्रकार बेचारा, काम के बोझ का मारा

पांच मंडल के पत्रकारों को मान्यता की हरी झंडी

दूरदर्शन में अब भी है दम  

भाषाई स‌रोकार और मीडिया 

अब न्यूज चैनल की 'दुकान' खोलना आसान नहीं 

क्यों नहीं कर पाए स‌च का स‌ामना?

दोबारा शुरू हुआ एग्रीग्रेटर  ब्लॉगवाणी

कामयाबी उम्मीदें बढ़ाती है: विजेंद्र

जल्दी में हैं बाबा रामदेव?

मैडम फिजा कुछ तो तमीज स‌ीखिए... 

शर्मसार करता एक 'जनवादी' अखबार

भगवा ओढ़ने को बेकरार पीली छतरी वाले

जी की जय, बाकी चैनलों के लिए मंदी बनी शोषण का हथियार 

दिनामलार के स‌ंपादक को जमानत

अखबारों को ये क्या होता जा रहा है?

इतिहास हो गया जियो-सिटीज

'हम न तो कोई जवाब देंगे और न ही उन्हें गालियां देंगे'

अब हिंदी में होगा डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू...

हिंदी ब्लॉग जगत को तोहफा, नया एग्रीग्रेटर 'ब्लॉग प्रहरी' लांच

नहीं रहे खबरों के शिल्पकार डॉ. रामकष्ण पांडेय

आर्थिक पत्रकारिता: बढ़ रही है 'अर्थ' की अहमियत

अब आया यूएनआई टीवी

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