उम्मीदें हैं तभी तो आलोचना है
-संजय द्विवेदी
आजकल मीडिया की आलोचना बढ़ गई है। मीडिया को बार-बार उसके सरोकार और दायित्वबोध की याद दिलायी जा रही है। यह सब हैरत में डालने वाला है। यहां तक कि कभी पुलिस, नेता और पाकिस्तान से आगे न जाने वाली मंचीय कवियों के निशाने पर भी मीडिया है। असल में यह मीडिया की बढ़ती ताकत का ही सबूत है। यह साबित करता है कि मीडिया से लोगों की अपेक्षाएं बहुत बढ़ गयी हैं। इसी वजह से बाकी स्तंभों से ज्यादा याद मीडिया की होती है। आज हर तरफ से मायूस लोग हर बीमारी को मीडिया ताकत से दूर करना चाहते हैं। पहले सभी दरवाजों से निराश आदमी अखबार से दफ्तर में आता था। आज वह सबसे पहले अखबार या न्यूज चैनल के दफ्तर में पहुंचकर इंसाफ मांगता है। स्टिंग आपरेशन और भ्रष्टाचार कथाओं तक पत्रकारों की पहुंच खोज से कम, जनता के सहयोग से ज्यादा कामयाब हो रही है।
लोकतंत्र के प्रति हमारी प्रतिबद्धता के बावजूद उसके तीनों स्तंभों-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के प्रति आम जनता में निराशा बढ़ी है। सामाजिक बदलाव के दौर से गुजरता देश जहां तेजी से आर्थिक प्रगति कर रहा है। वहीं समाज में असमानता भी बढ़ी है। शायद यही कारण है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के प्रति लोगों की उम्मीदें और शिकायतें भी बढ़ गयी हैं। पिछले 10 वर्षों का समय सूचना और मीडिया के व्यापक प्रसार का है तो उससे बढ़ती जा रही अपेक्षाओं का भी है। राजनीतिक तंत्र के प्रति अनास्था का विस्तार तो लंबे समय से जारी है किंतु धीरे-धीरे प्रशासन और न्यायपालिका के प्रति भी ऐसे ही भाव आने लगे हैं। इसके चलते मीडिया में जनमुद्दों की जगह बढ़ाने, सामाजिक दायित्वबोध को प्रखरता से व्यक्त करने की मांग बढ़ती जा रही है।
साफ कहें तो मीडिया एक ऐसा कंधा है जिसकी तलाश में आजहर आदमी है। सामाजिक शक्तियों के बिखराव, आंदोलनों की घटती शक्ति ने मीडिया पर निर्भरता बहुत बढ़ा दी है। मीडिया ही आपकी लड़ाई लड़े यह भाव अहमहो रहा है। 'हल्लाबोल' भाषा ने मीडिया को एक ऐसे शक्ति केन्द्र में तब्दील कर दिया है-जो हर समस्या का समाधान कर सकता है। सवाल पूछने और सवाल खड़े करने की ताकत ने मीडिया की महिमा बढ़ा दी है।
आज मीडिया चौतरफा आलोचना का केन्द्र बन रहा है तो उसका सीधा कारण है कि वह जनअपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पा रहा है। सूचना, शिक्षा, मनोरंजन से आगे उससे यह भी अपेक्षाएं की जा रही हैं वह नैतिक पुलिस का काम करे। हर अन्याय से जूझे। आम आदमी के सवालों को उठाए। जबकि उसका अर्थतंत्र और बाजार की ताकतउसे ऎसा करने से रोकती है। इसके बावजूद मीडिया तमाम मुद्दों को सामने ला रहा है। भ्रष्टाचार, अपराध के पीछे चेहरों को मीडिया उजागर कर रहा है। कई मामलों में प्रशासन, पुलिस और सरकारी तंत्र से पहले पहुंचकर मीडिया अपने इस दायित्वबोध की पुष्टि भी करता है।
मीडिया से बढ़ती जा रही उम्मीदें पूरा कर पाना संभव नहीं है। नेता, पुलिस, बाबूराज से तंग लोग बड़ी उम्मीदों से चौथे स्तंभ की तरफ देखते हैं। वे आशा रखते हैं कि मीडिया उन्हें इंसाफ जरूर दिलायेगा। मीडिया ऐसे प्रसंगों पर संवेदनशीलता का रूख अपनाकर अपनी जनपक्षधरता का अपेक्षित प्रदर्शन भी करता है। जिससे मीडिया सत्ताधीशों, प्रशासन और प्रभुवर्गों के निशाने पर आ जाता है। यदि वह इनमें से किसी के दबाव में आ जाता है तो उसे आम आदमी या पीड़ित पक्ष की आलोचना का केन्द्र बनना पड़ता है। ऐसे में मीडिया के लिए तटस्थ रह कर अपना ईमानदार कार्य संपादन बेहद कठिन हो जाता है। हालात ऐसे हैं कि उसे हर हाल में आलोचना ही भुगतनी है। भ्रष्टाचार में आंकठ लिप्त राजनेता, अधिकारी भी मीडिया को नैतिक प्रवचन देने से बाज नहीं आते। मीडिया के दायित्वबोध पर जब ऐसे लोग वक्तव्य देते हैं तो बहुत दया आती है।
समाज में घटती एकता, बढ़ता विभेद, सामाजिक संगठनों की घटती हुई शक्ति , बिखरते जन आंदोलन, सिमटते छात्र आंदोलन, पस्त पड़ गये मजदूर आंदोलन, अन्याय के खिलाफ प्रतिकार के लिए घटती सामाजिक शक्तियां, प्रशासनिक-राजनैतिक तंत्र में पसरी संवेदनहीनता, संवादहीनता, भ्रष्टाचार, घूसखोरी कुछ ऐसे कारण हैं जिसके चलते मीडिया का उपयोग करने की प्रवृत्तियां बढ़ी हैं। इस उपयोगितावाद में मीडिया के लिए भी अच्छे-बुरे विचार मुश्किल हो जाता है। खबर जल्दी देने की होड़ में कई बार तथ्यों की पूरी तरह पड़ताल नहीं हो पाती है। इस भ्रष्ट तंत्र में शामिल लोग भी एक-दूसरे के खिलाफ खबरें छपवाने के लिए मीडिया के इस्तेमाल की कोशिशें करते हैं।
खबर पाने का लोभ शायद ही कोई मीडियाकर्मी छोड़ पाता हो। यह आपाधापी नये तरह के दृश्य रच रही है। सामाजिक अपेक्षाओं की पूर्ति हर स्तर पर करने के बावजूद कहीं न कहीं कमी रह ही जाती है। लोकतंत्र के तीन स्तंभ यदि अपनी भूमिका को पुनर्परिभाषित नहीं करते और अपने दायित्वबोध के प्रति सजग नहीं होते तो मीडिया की ताकत अभी और बढ़ेगी। यदि हमारा तंत्र संवेदनशीलता के साथ काम करे, अंतिम व्यक्ति को न्याय देने का सामथ्र्य विकसित करे। तो हालात बेहतर होते नजर आएंगे। अराजक स्थितियां खबरों के लिए स्पेस बनाती हैं। यह गंभीरता से सोचें तो हमारी राजनीतिक - प्रशासनिक और सामाजिक व्यवस्था की कुछ कमियों ने मीडिया की प्रभुता का आकाश बहुत बड़ा कर दिया।
अब प्रभुवर्गों की सारी शक्ति इसी मीडिया को मैनेज करने लगी है। क्योंकि कोई भी खुद को आइने के सामने खड़ा करने को तैयार नहीं है। ऐसे में हमें अपने सामाजिक सरोकारों, दायित्वों को समझकर देश के प्रशासनिक - राजनीतिक तंत्र में भी वहीं संवेदना जगानी होगी, जिस संवेदना से मीडिया अपने दायित्वबोध को अंजाम देता आया है। शायद आलोचनाओं की जद में आज मीडिया इसलिए भी है क्योंकि लोगों की उम्मीदें सिर्फ उसी पर टिकी हैं। लोगों को भरोसा है कि मीडिया ही समाज में घट रहे अशोभन को घटने से रोक सकता है। मीडिया की आलोचना का तेज होता स्वर दरअसल उसकी बढ़ती स्वीकार्यता, शक्ति का ही प्रगटीकरण है। (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)
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