
राजीव सक्सेना
आखिर में ‘सच का सामना’ टीवी शो का हो ही गया सच से सामना। जैसा कि इस शो के शुरू होने पर हमने जुलाई में लिखे अपने आलेख में उम्मीद जताई थी कि दर्शक रिमोट के बटन से उसे स्क्रीन से ऑफ कर सकते हैं। हालांकि चैनल वाले कहते हैं कि उन्हें 52 एपीसोड ही करने थे, जो अंतिम प्रतिभागी ‘महाभारत’ की ‘द्रौपदी’ रूपा गांगुली के साथ पूरे हो गए। पहले हफ्ते के प्रसारण से ही विवादित हो गए इस शो के मोनोग्राम ‘हथेली पर आग की लपट’ बिना कोई लौ जगाए बुझ गई और अपने पीछे प्रतिभागियों के लिए टूटे संबंधों के लिए गहरे पछतावे का धुआं छोड़ गई। करोड़ों के प्रचार अभियान और भारी तामझाम के साथ शुरू हुए इस शो के इतनी जल्दी बंद होने का एक ही कारण समझ में आता है; दर्शकों द्वारा नकार दिया जाना।
यह पहला रीयलिटी शो था जिसका ऐतिहासिक विरोध हुआ। दर्शक इसकी बीमार थीम के वायरस से अपने पारिवारिक-सामाजिक जीवन को संक्रमित कराने के लिए तैयार नहीं थे। प्रतिभागियों के पूरे जीवन क्षेत्र को छोड़कर उसके बेडरूम में घुसना, अतीत-वर्तमान के दैहिक संबंधों पर संदेह करना और उनके बारे में ही पूछे गए सवालों पर महंगी बोली लगाना किसी को बर्दाश्त नहीं हुआ। आपाधापी और गलाकाट प्रतियोगिता वाले जीवन में हादसे की तरह चाहे-अनचाहे घट गए संबंधों का खुलासा करवाना नैतिकता या मर्दानगी नहीं थी।
अमेरिकी नकल और अधकचरे कन्सेप्ट पर बने इस शो का यदि भारत में यह हश्र नहीं होता तो अचरज होता। सेक्स चटखारे लेकर बिकता है, उसकी उत्तेजना संक्रामक होती है, यह तो मानकर चला गया लेकिन इस कारोबारी समझदारी में एक जरूरी बात नहीं समझी गई; भारतीय आबोहबा और इसमें बने पारिवारिक-सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्य। जरूरी चीजों की खरीदारी के लिए बाजार की निस्संदेह उपयोगिता है, पर हमने कुछ चीजों को खरीद-बिक्री से बाहर रखना तय किया हुआ है। ये हमारे जीवन मूल्य हैं। अत: एकाध एपिसोड के बाद ही दर्शकों पर यह साफ हो गया कि इस चैनल का तौर-तरीका किसी पोर्नोग्राफी से कम नहीं है और यह शो हमारे जीवन में रचे-बसे पारिवारिक मूल्यों पर चोट करता है।
बेहूदे व गुस्ताख सवालों के जवाब में टूटे रिश्तों के आजीवन सालने वाले दंश के अलावा कुछ हासिल होने वाला नहीं है। स्मिता मताई का परेशान चेहरा दर्शक भूले नहीं होंगे। ...तो इसे केवल दंपतियों ने ही नहीं उनके पूरे परिवार ने ‘सच का सामना’ को नकार दिया। एंकर राजीव खंडेलवाल द्वारा बेहद खूबसूरती से कंडक्ट किए गए शो मं‘सच का सामना’ करने आए ज्यादातर लोग सेलिब्रिटी थे। हाई-फाई नहीं, मंझोले किस्म के। शो वाले अपने सेट पर एक भी राजनीतिक नेता, सरकारी अफसर या एक भी धर्माचार्य को ‘सच का सामना’ करने के लिए नहीं बुला पाए। उनके पास खुलासे के लिए एक से एक राज थे। वे अपने गुनाहों को कबूल कर मानसिक रूप से स्वस्थ होते और जिससे इस तरह राजनीति को, प्रशासन को और धर्म को वह पवित्र दृष्टि मिलती और इन क्षेत्रों का भला हो जाता। वे आम आदमी को भी कैमरे के सामने नहीं बिठा सके, जो खुलासा करता कि वह अपने जीवन-संग्राम का सामना करने में किस तरह पस्त हो रहा है। यह व्यवस्था में बदलाव का सरोकार जगाता।
यह शायद इसलिए नहीं हुआ क्योंकि आम आदमी की चैनल की चकाचौंध में हैसियत ही क्या है? दरअसल, इस शो की कोई पारिवारिक या सामाजिक जिम्मेदारी नहीं थी। इसलिए राज्यसभा में मामला उठने पर सरकार के सूचना व प्रसारण मंत्री तक को ‘लक्ष्मण रेखा’ खींचने की बात करनी पड़ी थी। सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक दायरे में रह कर कोई स्टेप उठा पाती, इसके पहले ही सजग दर्शकों ने उसे स्क्रीन से आउट कर दिया है। इससे उम्मीद यह बंधी है कि भविष्य में जब कोई चैनल पारिवारिक-सामाजिक दायरे लांघने का दुस्साहस दिखाएगा वह ‘सच का सामना’ के हश्र को याद कर लेगा। (राष्ट्रीय सहारा से साभार)
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