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मेरे पास तो कोई प्लान नहीं है बॉस !Boss

कई बार ये जरूरी नहीं है कि कोई नतीजा निकले। चर्चा होती रहेगी। समय निकलता जाएगा। फैसला नहीं होगा। तो ऐसे में क्या करना सही होगा? क्या इंतजार का रास्ता अच्छा है? या फिर सामने वाले पर भरोसा कर के, खुद शांत बैठना समझदारी है? कुछ सवाल ऐसे हैं, शायद जिनके जवाब नहीं मिलतेकभी..!

वही घिसी-पिटी बात कहने का अर्थ दिखाई नहीं देता। पर मुद्दा तो यही है कि हो वही रहा है, जो घिसा-पिटा है। शायद इसीलिए, अब वक्त आ गया है कि कुछ किया जाए। यही सोच कर इस बार की मीटिंग में मुंह खोल ही दिया।

कोई सवाल न करे, तो ठीक है। जो हो रहा है होने दिया जाए, वो ठीक है। जो कुछ मैं कह रहा हूं, वो ठीक है। ये कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिन्हें लेकर हमारे बॉस खुद में खुश रहते हैं। मुझे ये सब लिखते हुए भी ओछा लग रहा है कि मैं अपने बॉस के बारे में ब्लॉग लिख रहा हूं। मेरे जीवन में कुछ नया, अच्छा नहीं है, जिसे मैं लिख सकूं। कुछ क्रिएटिव कर सकूं। पर ये वक्त ऐसा है, जो शायद हर किसी की लाइफ में आता होगा। जब आदमी आगे बढ़ने के स्ट्रगल में फंसा रहता होगा। सिर्फ और सिर्फ अपने काम के बारे में सोचता होगा। जाहिर तौर पर हर आम आदमी की तरह, अपने बॉस को कोसता होगा।

खैर, मुद्दा शुरू हुआ, एक मीटिंग से। 10 दिन पहले एक मीटिंग हुई। कॉम्पिटिशन और हमारे चैनल के टीआरपीचार्ट दिखाए गए। साफ कर दिया गया कि हमारा चैनल, हमारी टीम की वजह से नंबर वन नहीं है। वो तो शाम की टीम है, जो कुछ कमाल कर रही है, इसलिए, मार्केट में हमारी कुछ इज़्ज़त है, नहीं तो हमारे कपड़े उतरने में ज़रा भी वक्त ना लगे। हमसे सुझाव मांगे गए और हर बार की तरह बॉल हमारे कोर्ट में डाल कर आइडिया लेकर आने को कहा गया।

जैसे कि हर मीटिंग के बाद होता है, बाहर निकल कर लोगों ने अपने चैनल को गाली दी। साथ ही अपने मन में पल रहे उस कीड़े को फिर से चारा डाला, जो रोज़ तुमसे ये कहता है कि ये आदमी, जो तुम्हें अभी ज्ञान दे रहा था, वो चूहै। ज़ाहिर है, आगे कुछ नहीं हुआ।

10 दिन बाद एक दिन बॉस का मेल आया। मैंने 10 दिन पहले कुछ सुझाव मांगे थे, आपमे से कोई मेरे पास नहीं आया। आज शाम को मैं सबसे मिलना चाहता हूं। अलग अलग। फिर शाम को एक मेल आया कि आपको सुझाव लिखकर ले जाने हैं। जनता हरकत में आई। किसी ने 10 मिनट, किसी ने 15 मिनट कॉम्पिटिशन को देखा और अपने प्वाइंट्स बना लिए। कुछ ने तो देखा तक नहीं, अपने ही मन से अपने चैनल को बचाने के चार तरीके कागज़ पर लिखे, और जाकर बॉस की क्लास में हाजिरी दे आए।

बॉस ने भी प्यार से पूछा कि क्या प्लान है?

जी, ये प्लान है?

ये कैसे होगा?

जी ये ऐसे होगा?

ये कब से होगा?

जी कल से शुरू कर देते हैं। 2 हफ्ते में फर्क दिखेगा।

अच्छा ठीक है जी, जै राम जी की।

मोटे तौर पर सभी से यही बात हुई। हमारा नंबर आया तो हमने ये होमवर्क करने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि मैं बिना कागज के बात नहीं करुंगा। मैंने साफ कहा कि मैंने कोई चैनल नहीं देखा है। इसलिए मैं कुछ नहीं लिख सकता। उन्होंने कहा कि चैनल देखने को किसने कहा, जो आइडिया हो, वो बता दो। मैंने कहा मेरे पास कोई आइडिया नहीं है। मैंने कुछ नहीं सोचा। मेरे पास टाइम नहीं है।

बस, ये सुनना था कि भड़क उठे श्रीमान।

क्या ये काम जरूरी नहीं है।

हां, है।

तो फिर इसके लिए समय क्यों नहीं है।

मैं डेली रुटीन में फंसा हूं। मैं पीसीआर के अंदर बाहर ही करता रहता हूं, इसलिए टाइम नहीं है।

जब कोई जरूरी काम होता है तो क्या छुट्टी नहीं लेते हो।

हां लेता हूं।

तब डेली रुटीन का क्या होता है?

तो आप कह रहे हैं कि मैं शो छोड़कर ये सुझाव लिखता रहता और आपके पास आता और सुझाव देता।

मैं कह रहा हूं कि ये काम ज़रूरी है तो इसके लिए समय निकालना चाहिए था। ये मैं कैसे मान लूं कि 10 दिन में तुम्हें समय ही नहीं मिला।

देखिए भड़क कर तो बात बनेगी नहीं। अपसेट मत होइये, मैं यहां बात करने आया हूं, और ऐसे बात नहीं हो सकती।

तुम कहना क्या चाहते हो।

मैं ये कहना चाहता हूं कि इस समस्या का ये समाधान नहीं है। पिछली कई मीटिंग्स में ये चर्चा हो चुकी है। बात कही जा चुकी है कि एंकर को सही सवाल पूछने हैं, रिसर्चर को सही रिसर्च देनी है। प्रोड्यूसर को सही ग्राफिक्स दिखाने हैं। कंटेंट पर सब मिलकर काम करेंगे। अब मुझसे क्या चाहते हैं? यही सब फिर से लिख कर दे दूं? तो दे देता हूं। पर मुझे नहीं लगता कि इससे हम कहीं पहुंचने वाले हैं। जो लोग आपके पास कागज़ पर सुझाव लिखकर लाए हैं, वो बदलाव के लिए कितना सीरियस हैं, ये आप और मैं दोनों जानते हैं। शायद आप मुझसे बेहतर जानते हैं। पिछले 10 मिनट में ये कागज़ बनाए गए हैं। जो लिखा गया है, वो पिछले 10 मिनट में पकाया गया है। कोई सोच विचार नहीं किया गया। वजह क्या है? सिर्फ यही, कि बस कुछ दे दिया जाए, ताकि बेकार की चर्चा में न फंसे। समय खराब न हो। टाइम से घर चले जाएं। बस। अगर सोचा होता, तो अब तक कुछ किया होता।

तो तुमने सोचा है, क्या सोचा है?

मुझे लगता है कि इस पूरी परेशानी से निपटने का जो अप्रोच है, वो ही गलत है। हमें किसी और अप्रोच से काम करना होगा। पता नहीं कितनी बार हम मीटिंग कर चुके हैं। पता नहीं कितनी बार, एक दूसरे को सुझाव दे चुके हैं। पता नहीं कितनी बार हम एक वर्किंग या वर्केबल प्लान बना चुके हैं। पर क्या हुआ? कुछ नहीं। क्योंकि मैं करना ही नहीं चाहता तो आप मुझसे क्या करवा लेंगे भाई? आपके बस की नहीं है। मेरे मन में श्रद्धा नहीं है करने की तो कोई और कैसे करवा लेगा मुझसे काम? परेशानी ये है सर कि मैं चेस नहीं खेल रहा, क्रिकेट खेल रहा हूं। अगर मैं सेंचुरी बना भी लूं और मेरे बॉलर्स विकेट ना ले पाएं या बाकी बल्लेबाज हेल्प ही ना कर पाएं, तो मैं अकेला क्या कर लूंगा। हम हर बार अपने कोच के पास आएंगे औऱ एक स्ट्रैटजी बनाएंगे। पर जब हम मीटिंग से बाहर निकलेंगे, तो मेरा अपना एक एजेंडा होगा। अपनी एक स्ट्रैटेजी होगी औऱ फिर वही होगा, जो होता आ रहा है। इसलिए कुछ नहीं होगा।

बॉस फिर भड़क गए।

कोच पर भरोसा है कि नहीं। जो वो कर रहा है उसमें विज़न दिख रहा है कि नहीं? मैं काफी कुछ कर सकता हूं। पर मैं सही समय का इंतज़ार कर रहा हूं। कोई भी कदम उठाने से पहले कई फैक्टर्स हो सकते हैं। कभी बड़े बॉस का फैक्टर होगा। कभी कंपनी के सीईओका फैक्टर होगा। कभी किसी व्यक्ति के घर में कोई भयानक विपदा आन पड़ी हो सकती है। वो फैक्टर हो सकता है। बहुत कुछ हो सकता है।

और दूसरी बात, मुझे पता कैसे चलेगा कि कोई गलत कर रहा है या नहीं? जब 10 दिन पहले मैंने तुमसे कहा कि मुझे सुझाव दो। तब तुमने ये सब क्यों नहीं बताया? क्यों हर बार मुझे तुम्हें बुलाना पड़ता है, और फिर तुम एक एक कर के ये सब बातें सामने रखते हो। उस दिन ही कहना चाहिए था।

मैने कहा

मॉरली, मुझे ये सही नहीं लगता कि रोज़ रोज़ आपके पास आऊं और आपको कहूं कि फलां आदमी ने ये किया, और फलां ने ये नहीं किया। उससे मुझे ये परेशानी है और उसको अक्ल नहीं है। ये चुगली करने के बराबर है और मैं ये नहीं करूंगा।

तो तुमने भी तो एक स्टैंड ले लिया है। तुम्हारी भी अपनी स्ट्रैटेजी है। तुम में और दूसरे में क्या फर्क रह गया फिर? तुमने डिसाइड कर लिया कि मॉरली तुम ये नहीं करोगे तो तुम आज मेरे सामने शिकायत भी नहीं करोगे। खुद करो मैनेज।

वो तो मैं कर ही रहा हूं। मैं पिछले कई दिनों से दूसरों की जगह मेकअप कर रहा हूं। अगर सुबह साढ़े 10 बजे एक डिस्कशन है और 10.20 तक मेरे पर उस चर्चा के साथ चलाने के लिए ग्राफिक्स नहीं हैं, तो मैं कहीं से कोई फुटेज लाकर चैनल पर कुछ नया करने की कोशिश करता हूं। अगर मुझे चर्चा के प्वाइंट्स नहीं मिलते तो मेरे एंकर खुद कुछ नही करते, मैं उन्हें बताता हूं कि इस डिस्कशन को कहां ले जाना है। कैसे बात करनी है। मैं तो कर ही रहा हूं और आगे भी करता रहूंगा। मुद्दा ये है कि कब तक करता रहूंगा? कोई तो लिमिट होगी?

मैं भी किसी वजह से कोई कदम नहीं उठा रहा हूं। पर मुझे तु्म्हारा पेसिमिज़म पसंद नहीं आया। और जिस तरह से तुमने बात को रखा, वो पसंद नहीं आया।

मैंने कहा, लोग यहां पर सिर्फ आपसे ऑर्डर लेने को तैयार हैं। किसी की बात मैं क्यों सुनूं जब मैं सीधे बॉस से डील कर सकता हूं। तो मैं वहीं जाउंगा। पीसीआर में चिंधी से लोग, मुझे समझाते हैं कि ये ग्राफिक लूंगा और वो नहीं चलाउंगा। अरे, तुम हो कौन? टेक्निकल आदमी हो टेक्निकल की तरह बात करो। कंटेंट पर बात करनी है तो मैं करूंगा। तो आपके नाम की धमकी दी जाती है। मैं जब पीसीआर मैं बैठता हूं और तुम जानते हो कि मैं बहुत कम बैठता हूं तो मैं कंट्रोल में होता हूं।

बड़ी खुशी की बात है, पर वजह जानते हैं कि आप कंट्रोल में क्यों हैं? क्योंकि सामने वाला सिर्फ और सिर्फ आपके ऑर्डर्स लेने को तैयार है। और किसी से नहीं। लठैती करनी तो मुझे आती नही। साफ बात है।

नहीं, तुम बहुत पैसिमिस्टिक हो। तुमने पहले ही कह दिया कि ये तरीका काम नहीं करेगा।

हां नहीं करेगा। आप मुझे एक प्लान दे दीजिए, मैं उसे फॉलो कर लूंगा। बरसों से मैं यही करता आया हूं। आगे भी यही करुंगा। अपना दिमाग लगाने के लिए मत कहिए। मैं फिर से कहूंगा कि इस परेशानी से निबटने का ये अप्रोच गलत है। मैं होमवर्क नहीं करूंगा। मेरे करियर के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकता। इस टीम के साथ रह कर, मेरा करियर खराब हो रहा है। वो मैं नहीं चाहता।

खैर, ये चर्चा और भी चली। कई और मुद्दे हैं, जो मैं लिख नहीं पाया। पर मोटे तौर पर, इसी के आसपास हुई। एक बार फिर से इस चर्चा से कोई निदान नहीं निकला। कोई फायदा नहीं हुआ। हम कहीं नहीं पहुंचे। और चर्चा खत्म हो गई। एक बार फिर से मैं निराश हो कर घर वापस आ गया। (एक न्यूज चैनल के अनाम प्रोड्यूसर के ब्लॉग फर्जीवाड़ा की एक पोस्ट )

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