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शर्मसार करता एक 'जनवादी' अखबार

जनवादियों से हमेशा इस देश की जनता को आशा रहती है। ऐसे में जनवादी पत्रकारों से तो लोगों की आशाएं काफी बढ़ती हैं। फिर जब अखबार ही जनवादी हो तो क्या कहना? कम से कम चारणभक्ति जनवादी चरित्र में नहीं है। फिर जब अखबार जनवादी चला रहे हो तो चारणभक्ति की तो कोई गुंजाइश ही नहीं है। ऐसे में जब देश में एक दो अखबार जनवादी पत्रकारिता का दावा करे तो लोगों की उम्मीदें उनसे बढ़ जाती हैं। लेकिन जब वे ही प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष लोभ में चारणभक्ति में लग जाएं तो आप क्या कहेंगे?

चौथी दुनिया का 14 जून 2009 का अंक देखिए। पहले पृष्ठ पर ही राहुल गांधी विराजमान हैं, कवर स्टोरी के साथ। राहुल गांधी की फोटो से किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती है। राहुल गांधी इस देश की सबसे बड़ी पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं। पर जिस तरह से इस स्टोरी में राहुल गांधी की भक्ति की गई है उससे पता चलता है कि अब जनवाद जेपी और राम मनोहर लोहिया का नहीं है, जो आजीवन इस देश में नेहरू गांधी परिवार का विरोध करते रहे। जनवाद तो अब चारणभक्ति बन गया है। जेपी और लोहिया आजीवन कांग्रेस विरोध में लगे रहे, पर अब जनवादी चरित्र के लोग क्या कर रहे है? उसी कांग्रेस का गुणगान कर रहे हैं, जिसके विरोध में ही इस देश का जनवाद पला और बढ़ा।

 chauthi_duniyaइस कामर्शियल युग में जनवादी पत्रकारिता की बात कोई करे तो यह महानता है। जी हां बात चौथी दुनिया की हो रही है। दुबारा शुरु हुए इस साप्ताहिक अखबार से लोगों की भारी उम्मीदें थी। लेकिन जिस तरह इस अखबार ने अब कांग्रेस विशेषकर राहुल गांधी की चारणभक्ति शुरू की वो काबिलेगौर है। गौरतलब है कि इस मैगजीन के संपादक भी एक जनवादी संतोष भारतीय है विश्वनाथ प्रताप स‌िंह के करीबी रहे हैं। वीपी सिंह ने इस जनवादी नौजवान में काफी उर्जा देखी तो सांसद तक बना दिया। अब संतोष भारतीय एक बार फिर जनवाद को जिंदा करने में लगे हैं, लेकिन इस बार संतोष भारतीय के जनवाद के नायक वीपी सिंह नहीं, बल्कि राहुल गांधी हैं.

चलिए यह तो चौथी दुनिया की हेडिंग की बात हुई। इस खबर में इस्तेमाल वाक्यों और शब्दों में राहुल गांधी की भक्ति देखिए। अखबार लिखता है- दिल्ली की सत्ता के लिए राजनीतिक दलों ने जब टेढ़े और मुश्किल रास्ते अपना लिए थे, तब वह राहुल ही थे जिन्होंने गरीबों-अल्पसंख्यकों के बूते कांग्रेस की सीधी सरकार बनवा दी। अब वह एक नए रास्ते पर चल पड़े है,  जो केंद्र से राज्य की ओर जाता है।

अब ये हर अदना सा आदमी भी जानता है कि कांग्रेस की सरकार सीधी नहीं बनी है। कांग्रेस अभी नरसिम्हा राव से भी कम सीट लेकर संसद में पहुंची है। अभी भी द्रमुक और तृणमूल कांग्रेस की बैसाखी पर सरकार चल रही है। फिर जिस गरीब अल्पसंख्यक की बात हो रही है वो क्या सिर्फ यूपी में ही बसते हैंबिहार, उड़ीसा, छतीसगढ़ में गरीब-अल्पसंख्यकों को क्या हो गया? उन्होंने कांग्रेस को क्यों वोट नहीं दिया? अब जरा आगे देखिए, चौथी दुनिया का शब्दजाल। राहुल गांधी के बारे में लिखा जा रहा है- वह बेहद कूटनीतिक और अपार दूरदर्शी है। नीयत है देश पर निर्बाध, दशकों तक शासन करने की। योजना है मुख्य विपक्षी दलों को मटियामेट कर देने की। कवायद है राहुल गांधी को सही मायनों में हिंदुस्तान की सियासत का सिरमौर बनाने की।

चौथी दुनिया की चारणभक्ति की यह हद है। राहुल गांधी बेहद कूटनीतिक और अपारदूरदर्शी है। यह हम आप नहीं समय बताएगा। जब राजीव गांधी को 416 सीटें मिली थी तो वे भी अपार दूरदर्शी हो गए थे। फिर अभी तो कांग्रेस को राजीव गांधी की तरह 416 सीटें नहीं मिली हैं। राहुल गांधी 206 सीटों में ही अपार दूरदर्शी कैसे हो गए? फिर जब 410 सीटें आएगी तो क्या होगा? अब बात आती है दशकों तक देश पर शासन करने की। लेकिन इसमें नयी बात क्या है? नेहरू गांधी परिवार एक दशक या दो दशक तो क्या पिछले छह दशक तक इस देश पर राज कर रहा है। इसमें राहुल गांधी की क्या उपलिब्ध है? जहां तक विपक्षी दलों को मटियामेट करने की बात है तो विपक्षी दल इस देश में कभी मटियामेट नहीं हुए। विपक्ष हमेशा इस देश में रहा और सत्ता पक्ष को मौके के हिसाब से पटखनी देता रहा। चौथी दुनिया के संपादक संतोष भारतीय भी इस पटखनी के खेल में एक बार संसद का मुंह देख आए। विपक्ष इस देश में मटियामेट होता तो शायद राम मनोहर लोहिया नहीं होते, जेपी जैसे लोग नहीं होते। विश्वनाथ प्रताप सिंह नहीं होते जिन्होंने कांग्रेस की सत्ता ही उलट दी। इस बात को भारतीय पत्रकारिता जगत क्यों भूल जाता है कि देश में सत्ता परिवर्तन की लहर किसी युवा ने नहीं हमेशा साठ साल से ज्यादा उम्र के बुजुर्ग ने शुरू की। चाहे वो राममनोहर लोहिया हों या जय प्रकाशनारायण या विश्वनाथ प्रताप सिंह।


अब जरा इसी स्टोरी में राहुल गांधी की भक्ति की पराकाष्ठा देखिए। स्टोरी में लिखा गया है-
कांग्रेस अपार जनादेश के साथ अपने बलबूते केंद्र में बनी रहे, इसके लिए जरूरी है कि उसकी गहरी पकड़ हिंदी पट्टी पर बनी रहे। इससे बड़ा झूठ या राहुल भक्ति क्या हो सकती है, जो इस वाक्य में है। कांग्रेस को अभी अपार जनादेश कहां मिला कि अपने बलबूते पर केंद्र में बनी रहेगी। फिर आगे लिखते है कि जरूरी है कि उसकी गहरी पकड़ हिंदी पट्टी पर बनी रहे। बनी रहे शब्द का इस्तेमाल तो तब हो जब पकड़ पहले ही बन चुकी हो। हिंदी पट्टी में बिहार से कांग्रेस गायब है। यूपी में अभी 21 सीट ही मिली हैं। फिर इसका अर्थ यह हुआ कि पकड़ तो अभी बनानी है। ऐसे में पकड़ बनी रहे की बात कहां आती है। और तो और स्टोरी में राहुल गांधी को यूपी का मुख्यमंत्री बनाने की बात भी हो रही है। आगे वाक्य देखिए
-राहुल के एक बेहद करीबी मित्र बताते हैं कि यूपी मे जिस तरीके से इस बार कांग्रेस की वापसी हुई है, उसने कांग्रेस में एक नई जान फूंक दी है। राहुल इस जनादेश को हर हाल में कांग्रेस के साथ बनाए रखना चाहते हैं। इसके लिए उतर प्रदेश में अगले विधान सभा चुनाव में वह खुद को मुख्यमंत्री के तौर पर भी प्रोजेक्ट कर सकते हैं

पहली बात यह कि नेहरू गांधी परिवार की परंपरा में मुख्यमंत्री बनना नहीं रहा है। वे सीधे प्रधानमंत्री बनते हैं। वे जब प्रधानमंत्री बनाने की कुव्वत रखते हैं तो प्रधानमंत्री बनने की भी कुव्वत रखते हैं। दूसरी बात कांग्रेस को यूपी में जनादेश नहीं मिला है। क्या चौथी दुनिया को यूपी से आने वाले लोकसभा सदस्यों की संख्या की जानकारी नहीं है? यूपी में 80 लोकसभा की सीटें है। इसमें से मात्र 21 कांग्रेस ने जीती है। कांग्रेस से ज्यादा मुलायम सिंह ने 25 सीटें जीती हैं। जबकि मायावती ने 20 सीटें जीती हैं। जबकि भाजपा भीके आसपास पहुंची। ऐसे में यह गणित का नया फार्मूला समझ में नहीं आया कि 21 सीट वाली कांग्रेस को जनादेश मिलने की संज्ञा और 25 सीट वाले मुलायम सिंह यादव गोल। जबकि 20 सीटों वाली बसपा भी गोल। कांग्रेस को यूपी में जनादेश की बात तो तब होती जब कांग्रेस का आंकड़ा 10 से सीधा उछल कर 50 पर पहुंचता। स्टोरी में बताया गया है राहुल गांधी कांग्रेस के युवराज हैं। ये तो सारे जानते हैं। कांग्रेस में ऐसे चापलूसों की कमी नहीं है जो उन्हें युवराज ही संबोधित करते हैं। कांग्रेस में जो सत्ता में होता है वही राजा या युवराज होता है। सीताराम केसरी जैसे कमजोर अध्यक्ष भी सत्ता में थे तो राजा थे। अब जरा देखिए आगे स्टोरी क्या लिखता है
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राहुल कहते हैं कि इस चुनाव में कांग्रेस ने राज्य के लोगों को नई उम्मीदों से रू--रू कराया है। राज्य तकरीबन 20 सालों से यानी कि जब से वहां की सत्ता से कांग्रेस बाहर हुई है तब से धर्म और जाति पर आधारित जहर बुझी राजनीति का शिकार था। लेकिन अब कांग्रेस आने वाले वक्त में लोगों का नजरिया बदल देगी। राहुल उत्तर प्रदेश में बड़े बदलाव के पक्षधर हैं। कहते हैं कि वहां के सामाजिक ढांचे में व्यापक सुधार की जरूरत है। वहां के युवा को सकारात्मक सहयोग और मार्गदर्शन की जरूरत है। और वह कांग्रेस के संगठन के माध्यम से यही सब करने जा रहे हैं।


अब यह बताएं कि अगर 20 सालों से कांग्रेस यूपी में सत्ता से बाहर रही और वहां जाति की राजनीति होती रही तो इसकी शुरूआत कहां से हुई और किसने की? जाति की राजनीति शुरू करने का आरोप तो संतोष भारतीय जी के राजनीतिक गुरू विश्वनाथ प्रताप सिंह पर ही लगा। जब उन्होंने मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू की तो जातीय ध्रुवीकरण समाज में तेज हुआ। वीपी सिंह के मंडल की राजनीति के विरोध में भाजपा का कमंडल शुरू हुआ। कुल मिलाकर चौथी दुनिया खुलकर यह तो बताए कि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने ही यूपी में राजनीति की एक नई धारा शुरू की, जो पूरे यूपी को जाति और धर्म पर बांट गया। राहुल गांधी बड़े बदलाव के पक्षधर हैं इससे किसी को मतभेद नहीं है। इस देश में लोहियावादी भी भारी बदलाव के पक्षधर थे। जय प्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति के माध्यम से देश में बदलाव की बात की। विनोबा भावे ने भूदान से देश में भारी बदलाव की कोशिश की। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू कर देश में भारी बदलाव की कोशिश की। समाज में जाति और धर्म के नाम पर चाहे जितने आज बंटे हो, आज चाहे कांग्रेस जितनी बदलाव की बात करे, इस देश में दबे और कुचलों को अधिकार दिलाने में तो वीपी सिंह ही कामयाब रहे। उन्होंने देश की राजनीति में मै निफेस्टों की राजनीति को भी खत्म कर दिया। मैनिफेस्टों की सेंटिटिटी खत्म कर दी। उन्होंने उस मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू की जो जनता दल के चुनावी मैनिफेस्टो में नहीं था। जबकि आज कांग्रेस वो काम भी नहीं कर पा रही है जो मैनिफेस्टों में घोषित किया गया है।


राहुल गांधी की तारीफ लिखते हुए चौथी दुनिया यह भूल जाता है कि जो खबर लिखी जा रही है वो खबर है भारत के प्राचीन इतिहास का वर्णन नहीं। फिर इतिहास लिखते हुए भी इस तरह की भाषा का प्रयोग सिर्फ दक्षिणपंथी इतिहासकार करते हैं। स्टोरी में लिखा गया है-- युवराज ने रणभेरी बजा दी है। वे उत्तर प्रदेश के सिंहासन फतह करने निकल पड़े हैं। राहुल के इस कदम से समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पाटीं में खलबली मची हुई है। राहुल के तरकश में वो सभी बाण हैं जो विरोधी पार्टिंयों को बेजान कर दें।

युवराज तक तो सही था। लेकिन सिंहासन फतह करना, तरकश में वो सभी बाण। सपा बसपा में खलबली। समझ में नहीं आता कि चौथी दुनिया खबर लिख रहा है या दक्षिणपंथी कलम से मौर्य या गुप्तकालीन इतिहास? सामान्य रुप से मध्यकालीन इतिहास में भी इस तरह की भाषा का प्रयोग नहीं होता है। मध्यकालीन इतिहास के लेखक भी इस तरह की भाषा का प्रयोग नहीं करते. वास्तव में इस तरह की भाषा का प्रयोग दक्षिणपंथी स्कूल के इतिहासकार करते हैं। जनवादी, समाजवादी, वामपंथी इतिहासकार इस तरह की भाषा से काफी दूर रहते हैं। अब तो समझ में नहीं आता कि अगर जनवादी पत्रकारिता की भाषा अश्वमेध यज्ञ स्टाइल की होगीतो आने वाले दिनों में जनवाद का क्या होगा? और आखिर में एक बात. इस खबर से ही संतोष करिए क्योंकि आप अखबार शायद न खरीद पायें क्यों कि जनवाद को समर्पित यह अखबार बाजार में मिलता भी है तो कीमत है 20 रूपये


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