-गंगा प्रसाद विमल
नई कहानी धारा के लेखकों में ख्यात राजेंद्र अवस्थी ने ‘लमसेना’ जैसी कहानियां लिखकर हिंदी कहानी को एक ऐसे लोक से परिचित कराने के साथ किया जिसका लोक जीवन दुनिया के लिए विस्मय की चीज़ बना। बस्तर के आदिवासी क्षेत्रों का वह लोक समुदाय नृवंशशास्त्रीय समाजशास्त्रीय, फिल्मकारों और रंगकर्मियों के लिए भी एक उर्वर भूमि बना। इसी समकाल में वैरियर एल्विन के अध्ययन और फिर इन अछूते क्षेत्रों में शिक्षा, सामुदायिक किस्म के प्रजातांत्रिक कार्यक्रम इस तेजी से चलने लगे कि राजेंद्र अवस्थी आदिवासी आंचलिक कथाकार के रूप में विख्यात होने लगे।
पत्रकार के रूप में नागपुर के नवभारत से यात्रा करनेवाले राजेंद्र अवस्थी का दूसरा पड़ाव उस काल का बंबई और आज का मुंबई बना। हिंदी की बहुचर्चित कथापत्रिका सारिका के संपादन से राजेंद्र अवस्थी का जुड़ाव हुआ और बाद में वे दिल्ली चले आए। उस काल के प्रसिद्ध साहित्यकारों से उनके घने संबंध बने। धर्मयुग के संपादक और कथाकार धर्मवीर भारती ने ‘कथादशक’ की योजना द्वारा नई कहानी को लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचाने का कार्य किया। राजेंद्र अवस्थी का ‘मछली बाज़ार’ उपन्यास मुंबई पर दूसरा उपन्यास था जिसने हिंदी जगत का ध्यान अपनी ओर खींचा। इस बीच राजेंद्र अवस्थी दिल्ली आ गए और बच्चों की पत्रिका के संपादन के बाद कादम्बिनी का संपादन संभाला। इस दौरान राजेंद्र अवस्थी देश-विदेश के साहित्य को देशी और विदेशी अनुवादकों के सहारे अपने स्तर पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित करवाते रहे।
राजेंद्र अवस्थी नहीं रहे
दिल्ली। राजेंद्र अवस्थी नहीं रहे। जाने-माने पत्रकार और लेखक राजेन्द्र अवस्थी का 30 दिसंबर की सुबह दिल्ली में निधन हो गया। 79 साल के राजेंद्र अवस्थी काफी अरसे से बीमार थे और आखिरकार जब उनके शरीर के महत्वपूर्ण अंगों के काम करना बंद कर दिया तो उन्होंने जिंदगी को अलविदा कह दिया। उनके परिवार में तीन बेटे और दो बेटियां हैं। उनका अंतिम संस्कार दोपहर को दिल्ली केलोदी रोड स्थित शवदाह गृह में कर दिया गया। राजेंद्र अवस्थी की पांच-छह महीने पहले हृदय की बाइपास सर्जरी हुई थी। कुछ दिनों पहले तबीयत बिगड़ने के कारण उन्हें एस्कॉर्ट अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वह पिछले कई दिनों से वेंटिलेटर पर थे। मध्य प्रदेश के गढा जबलपुर में 25 जनवरी, 1930 को जन्मे राजेन्द्र अवस्थी नवभारत टाइम्स, सारिका, नंदन, साप्ताहिक हिन्दुस्तान और कादम्बिनी के संपादक रहे। उन्होंने अनेक उपन्यासों कहानियों एवं कविताओं की रचना की। वह ऑथर गिल्ड आफ इंडिया के अध्यक्ष भी रहे। 1997-98 में दिल्ली सरकार की हिन्दी अकादमी ने उन्हें सम्मानित किया था। राजेंद्र अवस्थी के उपन्यासों में सूरज किरण की छांव, जंगल के फूल, जाने कितनी आंखें, बीमार शहर, अकेली आवाज और मछलीबाजार शामिल हैं। मकड़ी के जाले, दो जोड़ी आंखें, मेरी प्रिय कहानियां और उतरते ज्वार की सीपियां, एक औरत से इंटरव्यू और दोस्तों की दुनिया उनके कविता संग्रह हैं। उन्होंने जंगल से शहर तक नाम से एकयात्रा वृतांत भी लिखा है। हिन्दी अकादमी के उपाध्यक्ष प्रो. अशोक चक्रधर कहा कि कादम्बिनी के संपादक के रूप में उन्होंने बिन्दु-बिन्दु विचार से ज्ञान का अथाह समुद्र पैदा किया और पाठकों में अपनी गहरी पहचान बनाई। उनका जाना पत्रकारिता और साहित्य दोनों क्षेत्रों के लिए अपूरणीय क्षति है।
राजेंद्र अवस्थी लेखकों की भारतीय संस्था आथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया से जुड़े और विनोदपूर्वक लोग टिप्पणी करते रहे कि उन्होंने उसे जेबी संस्था बना डाला किंतु श्रीमान केकर, डॉ कर्ण सिंह, डॉ लक्ष्मीमल्ल सिंघवी जैसी हस्तियों को उन्होंने भारतीय लेखकों की शीर्ष संस्था से जोड़े रखा। आजकल प्रसिद्ध समाजसेवी डॉ बिंदेश्वर पाठक इससे जुड़े हुए हैं। राजेंद्र अवस्थी की अपनी प्रकृति भारत को उसके अछूते पक्षों की मार्फत जानने की जिस रूप में विकसित हुई, आज उस पर बहस की जा सकती है। परंतु अब तक वैज्ञानिक आधारों पर न तौले गए पक्षों को उन्होंने अपनी पत्रिका में जगह दी। कभी कभी उन्होंने झूठे दावेदारों का पर्दाफाश भी किया परंतु उनकी छवि तंत्र-मंत्र के विषम जाल को जनोन्मुख बनाने वाले संपादक के रूप में निर्मित हो गई।
राजेंद्र अवस्थी भरसक उस मिथक को तोड़ने की कोशिश करते रहे किंतु वे एक ऐसे अभिनेता के रूप में विख्यात हो गए जो अपने एक आदर्श चरित्र के रूप में ढल जाता है। इन पंक्तियों के लेखक को राजेंद्र अवस्थी के साथ देश-विदेश में एक साथ जाने का मौका मिला और उस दौरान विलक्षण किस्म के अनुभव हुए। पहला तो यही कि जब अवस्थी जी से कहा जाता कि ‘मित्रवर अगर आपके चार प्रशंसक हैं तो चार हज़ार आलोचक भी हैं।’ तो वे उत्तर देते ‘नाम लेने वाले चार हजार चार’ लोग तो हैं।
आंकड़ों की इस दुनिया में वे अपने ढंग के खिलाड़ी थे। एक बार जब लक्ष्मीमल्ल सिंघवी, जो लंदन में उच्चयुक्त थे, के आमंत्रण पर हम वहां थे तो एक रात अपने ठिकाने की दिशा भूल गए थे। उच्चयोग का विदेशी ड्राइवर पता नहीं खोज पाया तो अवस्थी जी ने कहा अरे वह वही जगह है जहां इक्यावन कारें बिक्री के लिए खड़ी थीं। अचरज नहीं होना चाहिए कि विदेशी ड्राइवर हमें उसी स्थान पर ले आया। अंकों, आंकड़ों और ज्योतिष की गणनाओं में रुचि रखने वाले अवस्थी दूसरी बहुतेरी चीजों में दिलचस्पी रखते थे किन्तु सबसे ज्यादा लगाव उन्हें शब्दों से था। उनका ‘काल चिंतन’ इस दृष्टि से गद्य का एक अनुपम लेखन है।
उनकी कृतियों के अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुए हैं। सोवियत संघ के अस्तित्व के दिनों राजेन्द्र अवस्थ अन्तर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक गतिविधियों से भी जुड़े और निकोलाई रोरिक के विचारों से प्रेरित ‘संस्कृति के द्वारा शांति’ के अभियान में लगी संस्था से सम्बद्ध हुए। पाठकों को याद होगा कि संस्कृति द्वारा शांति के अभियान की अनेक गतिविधियां विश्व भर में जारी हुईं और भारत में विशेष रूप में नग्गर (कुल्लू) तथा मध्य हिमालय के दूसरे क्षेत्रों में उसकी सक्रिय लहरी कारगर ढंग से संगोष्ठियों-संवादों के रूप में भारतीय और विदेशी रचनाकारों, कलाकारों और विद्वानों को अपनी ओर खींच लाई। सबके बीच जोड़ बैठाने का काम राजेन्द्र अवस्थी द्वारा सम्पन्न हुआ।
एक कथाकार, एक संपादक, एक आयोजक, एक अनुवादक के साथ-साथ एक चिन्तक के रूप में राजेन्द्र अवस्थी की भूमिका का अध्ययन अभी शेष है और अब उनके जाने के बाद इसकी जरूरी और संभावना बढ़ गई है, यह जानते हुए कि चार हजार चार के आंकड़े का गणित हमेशा बढ़ता ही रहता है। (hindustan)
-अरुण कुमार जैमिनि
हो सकता है कि आप में से बहुत से लोग राजेन्द्र अवस्थी को न जानते हों। लेकिन उनसे पूछिए जो राजेन्द्र अवस्थी को जानते हैं, जिन्होंने उनके साथ काम किया है और उन्हें, जिन्होंने उनके साथ पूरे एक युग को जिया है। दस-ग्यारह वर्ष पुरानी घटना है।
अवस्थीजी राजस्थान पत्रिका के एक कार्यक्रम में जयपुर गए हुए थे। मैं भी उनके साथ था। वहां उनकी मुलाकात पत्रकारिता के श्लाका पुरुष कर्पूर चंद कुलिशजी से हुई। अवस्थीजी पूछ बैठे- ‘कुलिशजी मैं राजेन्द्र अवस्थी हूं। क्या आपने पहचाना?’ कुलिशजी का जवाब था- ‘राजेन्द्र अवस्थी कोई भूलने की चीज है?’ इसके बाद बातें तो बहुत हुईं लेकिन न भूलने वाली बात याद रह गई। अवस्थीजी किसी के लिए दोस्त थे तो किसी के लिए प्रेमी। ‘गुरुजी’ तो न जाने वे कितनो के होंगे। पक्के यारबाज। दोस्ती में किसी भी हद तक चले जाने वाले। सहज इतने कि ऑफिस के बाहर कभी ‘बॉस’ नहीं हो पाए। कभी न हार मानने वाले। जीते जी तो उनका संघर्ष देखा ही। मृत्यु से तेरह दिन पूर्व का संघर्ष भी देखा। मृत्यु बार-बार उनके पास आती रहती और वे लगातार उसे ज़िदगी का रास्ता दिखाते रहे।
बड़ी बात नहीं जब मौत ने भी थक-हार कर उसे विनती की हो कि ‘गुरुजी’ अगर आप हमारे साथ नहीं चले तो विधि के विधान में रुकावट आ जाएगी। तब पत्रकारिता के भीष्म पितामह ने सोचा होगा कि नहीं अपनी जीत के लिए वे दूसरे को पराजित नहीं करेंगे, ईश्वर की इच्छा का सम्मान हो, यही सोच कर उन्होंने इस दुनिया से दूसरी दुनिया में जाने निर्णय ले लिया हो। उनके इस निर्णय से हम और आप ही नहीं, पूरा साहित्यिक और पत्रिकारिता जगत स्तब्ध है, शोकमग्न है। अवस्थीजी का सम्म्मान सिर्फ इसलिए नहीं है कि वे कथाकार, संपादक, विचारक, तंत्र-मंत्र के ज्ञाता थे। बल्कि इसलिए है कि वे जिसके साथ खड़े हो जाते थे उस व्यक्ति का कद बुलंदियां छूने लगता था। आज की दुनिया में कद छोटा करने वाले तो बहुत मिलेंगे लेकिन दूसरों का कद बड़ा करने वाले अवस्थीजी जैसे विरले ही हैं।
उन्होंने मछली बाजार, भंगी दरवाजा, जंगल के फूल, बीमार शहर, सूरज किरण की छांव जैसे कई बहुचर्चित उपन्यास लिखे। एक फिसलती हुई मछली, एक औरत से इंटरव्यू और दो जोड़ी आँखें जैसे कहानी-संग्रह भी खूब चर्चित हुए। जबलपुर में जन्में। नागपुर से ‘नवभारत’ से अपना करियर शुरू करने वाले अवस्थीजी ‘सारिका’ से होते हुए बाल पत्रिका ‘नंदन’ के पहले संपादक और फिर इक्कतीस साल तक ‘कादम्बिनी’ का संपादन। स्वर्गीय मनोहर श्याम जोशी के बाद तीन साल तक ‘कादम्बिनी’ के साथ-साथ ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ का भी संपादन किया। कामयाबी और शोहरत तो जैसे अवस्थीजी के कदम चूमने को बेताब रहा करती थी। उनके संपादन में निकाले गए ‘कादम्बिनी’ के तंत्र विशेषांकों को लोग आज भी नहीं भूला पाए हैं। उस जमाने में उनके बहुत से प्रशंसक तो उनके लिखे ‘काल-चिंतन’ के कारण ही ‘कादम्बिनी’ लेते थे।
दुनिया का ऐसा कौन सा कोना हो जो उन्होंने न देखा हो। उनकी इसी घूमंतु आदत के कारण उन्हें इंडियन एयरलाइंस द्वारा ‘विश्व यात्री’ का सम्मान भी दिया गया था। बस घूमने को एक यही अनंत की यात्रा रह गई थी अवस्थीजी के लिए। सो आज वे इस इस यात्रा पर भी चल दिए,वापसी का टिकट लिए बिना ही। (हिंदुस्तान)
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