अखबारों को ये क्या होता जा रहा है?

-संजय द्विवेदी
अखबार की दुनिया इन दिनों खासी बेचैन है। बाजार के दबाव और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच उलझी अखबारी दुनिया नए रास्तों की तलाश में है। तकनीक की क्रांति, अखबारों का बढ़ता प्रसार, संचार के साधनों की तेजीने इस पूरी दुनिया को जहां एक स्वप्नलोक में तब्दील कर दिया है वहीं पाठकों से अखबार के रिश्तेको व्याख्यायित करने की आवाजें भी उठने लगी हैं।ज्यादा पृष्ठ और ज्यादा सामग्री देकर भी आज अखबार अपने पाठक से जीवंत रिश्ता जोड़ने में नाकाम हैं। यह अखबार से जुडे लोगोंके सामने एक बड़ा सवाल है। क्या बात है कि पहले पाठक कोअपने ‘खास’ अखबार की आदत लग जाती थी। वह उसकी भाषा, पेशकश और संदेश से जुड़ाव महसूस करता था, लेकिन अब वह आसानी से अखबार बदल लेता है। अखबार विक्रेता मनचाहा दे देता है और पाठक किसी खास अखबार की तरफदारी में खड़ा नहीं होता। तो क्या हिंदी अखबार अपनी पहचान खो रहे हैं? क्या उनकी अपनी विशिष्टता खत्म हो रही है? जाहिर है पाठक को सारे अखबार एक से दिखने लगे हैं। ‘जनसत्ता’ जैसे प्रयोग भी अपनी चमक खो रहे हैं।
आज अखबार के प्रकाशन ने उद्योग की शक्ल ले ली है। अखबार निकालना अब सीधे प्रकाशक के आर्थिक लाभ से जुड़ गया है। व्यवसायीकरण का यह दौर पत्रकारिता के सामने चुनौती जरूर दिखता है, लेकिन रास्ता भी इसी से निकालना होगा। पत्रकारिता का भला-बुरा जो कुछ भी है वह अखबारों के प्रकाशक की रीति-नीति पर निर्भर करता है। ऐसे में समाचार-विचार के मसले पर अखबार मालिक को चुनौती भी कैसे दी जा सकती है? अखबारों का प्रबंधन यदि संपादक की ताकत को स्वीकारकर रहा है तो आप बेबसखड़े देखने के अलावा क्या कर सकते हैं? काबिले गौर है कि पत्रकार अपनी भूमिका और दायित्वों पर बहस के बजाए अखबार मालिकानकी भूमिका के बारे में ज्यादा बातें करते हैं।
अखबार की घटती लोकप्रियता और संपादक के घटते कद ने मालिकों की सीमाएँ बढ़ा दी हैं। अखबार अगर वैचारिक रास्ता छोड़कर बाजार की हर सड़ी-गली मान्यताओं को कबूल करते जाएंगे तो यह खतरा बढ़ता ही जाएगा। आज मालिक-संपादक के रिश्तों की तस्वीर बदल चुकी है। आज का रिश्ता प्रतिस्पर्धा और अविश्वास का रिश्ता है। आज लोग बीबीसी की खबरों पर तो भरोसा करते हैं लेकिन अपने अखबार की खबरों पर नहीं। अगर अखबारों एवं पाठकों के बीच दूरियां बढ़ रही हैं तो आश्चर्य क्या है? अगर आप पाठकों एवं उनके सरोकारों की चिंता नहीं करते तो पाठक आपकी चिंता क्यों करेगा? ऊंचे प्रतिष्ठानों, बड़ी-बड़ी छपाई मशीनों और आकर्षक रंगों के साथ छपने के बावजूद अखबार अपनी अहमियत क्यों खो रहे हैं? यह सवाल एक बड़ी चुनौती है। बाजार के दबाव के बावजूद अखबार सिर्फ उद्योग की भूमिका में नहीं रह सकते। व्यापार के भी नियम-कानून होते हैं। व्यापार के नाम पर पाठकको मूर्ख नहीं बनाया जा सकता।
स्वतंत्रता मिलने के बाद राजनीतिक नेताओं, अफसरों, माफिया गिरोहों की सांठगांठ से सार्वजनिक धन की लूटपाट एवं बंदरबांट में देश का कबाड़ा हो गया, लेकिन हिंदी अखबारों की इन प्रसंगों पर कोई जंग या प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिलती। उल्टे ऐसे घृणित समूहों-जमातों के प्रति नरम रवैया अपनाने और उन्हें सहयोग देने के आरोप पत्रकारों पर जरूर लगे। सत्ता प्रतिष्ठानों के प्रति समर्पण ने अखबारों की गरिमा गिराई है। पूरे अखबार उद्योगको कलंकित किया है। यही वजह है कि आज अखबार आम जनता की आवाज नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों के 'फॉलोवर' बन गए हैं।
अखबारों की जिम्मेदारी थी कि वो आम पाठकों के पास तक पहुंचते और उनसे स्वस्थ संवाद विकसित करते। कुछ अखबारों ने ऎसी कोशिशें की भी लेकिन यह उनका चरित्र नहीं बन सका। बड़े हिंदी अखबारों ने आमतौर पर शहरी मध्यवर्ग को ध्यान में रखकर सारा ताना-बाना बुना। लिहाजा अखबार सिर्फ इन्हीं पाठकों के प्रतिनिधि बनकर रह गए। इसीलिए आज एक बड़ा तबका गरीबी, अत्याचार और व्यवस्था का दंश झेल रहा है। ऐसे में अखबारों पर सवालिया निशान लगते हैं तो अचरज कैसा? अंग्रेजी के अपने ‘खास’ पाठक वर्ग के चलते उनकी जिम्मेदारियां अलग हैं। हिंदी अखबारों को अपनी तुलना भाषाई अखबारों से करनी चाहिए, जो आज स्वीकार्यता के मामले में अपने पाठकों के बीच खासे लोकप्रिय हैं। हिंदी अखबारों में वैचारिकता एवं बौद्धिकता का स्तर लगातार गिरा है। अब तो गंभीर समझे जाने वाले हिंदी अखबार भी अश्लील एवं बेहूदा सामग्री परोसने में संकोच नहीं करते और यह सारा कुछ इलेक्ट्रानिक मीडिया के आतंक में हो रहा है। इस आतंक में आत्मविश्वास खोते संपादक कुछ भी छापने पर आमादा हैं। सनसनी, झूठ और अश्लीलता उन्हें किसी से परहेज नहीं है।
हिंदी क्षेत्र में एक नए प्रकार के पाठक वर्ग का उदय हुआ है जो सचेत है और संवाद को तैयार है। वह तमाम सूचनाओं के साथ आत्मिक बदलाव वाला अखबार चाहता है। वह सच के करीब जाना चाहता है। इसलिए चुनौती अहमियत की है और यह जंग हिंदी अखबारों को पाठकों के साथ जुड़कर ही जीतनी होगी। क्योंकि लाख नंगेपन से भी अखबार इलेक्ट्रानिक मीडिया का मुकाबला नहीं कर सकता। इसके लिए पाठक में संवेदना जगानी होगी। संवाद करना होगा। आने वाले वक्तकी चुनौतियों, बाजार के गणित परविचार करते हुए अखबार खुद को तैयार करें, यही वक्तकी मांग है। (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)
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