पत्रकार बेचारा-काम के बोझ का मारा
सर्वे कहता है पत्रकारों पर है जरूरत से ज्यादा काम का भार, नतीजतन हर पत्रकार है बीमार...
मीडिया स्टडीज ग्रुप ने पत्रकारों की कार्य स्थिति तथा जीवन स्तर का पता लगाने के मकसद से 13 जुलाई 2008 से 13 जून 2009 के बीच एक सर्वेक्षण किया है। सर्वेक्षण के अनुसार 65 फीसदी से अधिक पत्रकार आठ घण्टे से अधिक काम करते हैं जिसका परिणाम है लगभग हर पत्रकार किसी न किसी रोग से पीड़ित है। मीडिया क्षेत्र में सर्वाधिक रोगी हड्डी एवं रीढ़ तथा मधुमेह से संबंधित समस्याओं के हैं। यदि पत्रकारों को लेकर किए गए एक अध्ययन पर गौर करें तो 14.34 प्रतिशत पत्रकारों को हड्डी एवं रीढ़ में तकलीफ का सामना करना पड़ रहा है, जबकि 13.81 फीसदी मीडियाकर्मी मधुमेह से पीड़ित हैं। 13.50 प्रतिशत मीडियाकर्मी हृदय एवं रक्तचाप सम्बंधी रोगों से पीड़ित हैं, जबकि दंत रोग से पीड़ित मीडियाकर्मियों की संख्या 11.39 फीसदी है।
वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया और शोधार्थी देवाशीष प्रसून की टीम द्वारा किए गए अध्ययन में कहा गया है कि 13.08 प्रतिशत मीडियाकर्मी उदर रोगों से पीड़ित हैं। 11.81 फीसद नेत्र रोग तथा 2.10 प्रतिशत मीडियावाले कमजोरी, थकान और सिरदर्द जैसी समस्याओं से परेशान हैं। 48.06 प्रतिशत मीडियाकर्मियों का यह कहना है कि उन्हें उपचार के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है, जबकि 51.94 फीसदी मीडियाकर्मियों को इलाज के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि 61.27 प्रतिशत मीडियाकर्मियों के खाने पीने का कोई निध्रारित समय नहीं है, जबकि 17.61 फीसदी मीडियाकर्मियों ने अपने भोजन का समय निर्धारित कर रखा है।
अध्ययन के अनुसार 54.17 प्रतिशत मीडियाकर्मी अपनी नौकरी के मामले में असुरक्षा महसूस करते हैं लेकिन 45.82 प्रतिशत अपनी नौकरी को सुरक्षित मानते हैं। 12.59 फीसदी मीडियाकर्मियों ने अब तक छह या इससे अधिक जगहों पर अपनी सेवाएं दी हैं, जबकि 66.43 प्रतिशत मीडियावाले दो से पांच नौकरियां बदल चुके हैं। एक ही संस्थान या संगठन में काम करने वालों का प्रतिशत 28.8 है। 56.25 प्रतिशत मीडियाकर्मी दस किलोमीटर या इससे अधिक दूरी तय कर अपने कार्यालय पहुंचते हैं, जबकि 21.53 फीसदी मीडियाकर्मियों को इसके लिए पांच से दस किलोमीटर तक की दूरी तय करनी पड़ती है। एक से पांच किलोमीटर तक की दूरी तय करने वालों का प्रतिशत 10.06 है, जबकि कार्यालय आने के लिए एक से भी कम किलोमीटर की दूरी तय करने वालों का प्रतिशत 4.17 है।
16.32 फीसदी मीडियाकर्मी अपने दफ्तर पहुंचने के लिए सिर्फ मेट्रो का इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि 11.58 फीसदी को मेट्रो के अलावा दूसरे परिवहन साधनों का भी इस्तेमाल करना पड़ता है। कार से दफ्तर पहुंचने वालों का प्रतिशत 13.16 है जबकि 18.42 फीसदी मीडियाकर्मी स्कूटर या मोटरसाइकिल से कार्यालय पहुंचते हैं। 13.68 फीसदी मीडियाकर्मी तिपहिए से दफ्तर पहुंचते हैं जबकि 10 प्रतिशत बस के जरिए कार्यालय पहुंचते हैं। दिन की पाली में काम करने वाले मीडियाकर्मियों की संख्या 52.35 फीसदी है, जबकि 21.76 प्रतिशत शाम के समय काम करते हैं। 14.71 फीसदी मीडियाकर्मियों का काम रात के समय निश्चित होता है और 11.18 फीसदी सुबह की पाली में अपने काम को अंजाम देते हैं। सर्वेक्षण के अनुसार 61.63 फीसदी मीडियाकर्मियों का पसंदीदा क्षेत्र प्रिंट मीडिया है, जबकि टेलीविजन 22.09 प्रतिशत की पसंद है।
4.65 प्रतिशत मीडियाकर्मी खुद को किसी समाचार एजेंसी में काम करने का इच्छुक बताते हैं। 54.55 प्रतिशत मीडियाकर्मी अपने काम से संतुष्ट हैं, जबकि 45.45 प्रतिशत असंतुष्ट। 65.51 फीसदी मीडियाकर्मियों को प्रतिदिन आठ घंटे से अधिक समय तक काम करना पड़ता है जबकि 23.65 फीसदी ने कहा कि उनसे आठ घंटे ही काम लिया जाता है। 12.84 प्रतिशत मीडियाकर्मियों ने कहा कि उन्हें आठ घंटे से भी कम समय तक काम करना पड़ता है। 71.53 फीसदी मीडियाकर्मियों को एक दिन का साप्ताहिक अवकाश मिलता है और 17.36 प्रतिशत को दो दिन का साप्ताहिक अवकाश मिलता है जबकि 11.11 प्रतिशत मीडियाकर्मी ऐसे हैं जिन्हें कोई अवकाश ही नहीं मिलता। 4.41 प्रतिशत मीडियाकर्मी पिछले पांच साल से अस्वस्थ महसूस कर रहे हैं जबकि 6.62 प्रतिशत की पिछले तीन साल से तबियत अच्छी नहीं है। सर्वेक्षण के लिए पत्रकारों से ई-मेल के जरिए सवाल पूछे गए जिन पर प्रतिक्रिया देने वालों में 83.67 प्रतिशत पुरूष तथा 16.33 प्रतिशत महिलाएं हैं।(मीडियाविस्फोट डॉट कॉम से साभार)
अमीर भारतीयों को पसंद है अपनी भाषा में टीवी
एक सर्वेक्षण के मुताबिक ज्यादातर समृद्ध भारतीय अंग्रेजी अखबार पढ़ना पसंद करते हैं लेकिन जब बात टीवी देखने की आती है तो उन्हें स्थानीय भाषा ही रास आती है। समृद्ध भारतीय तबके की जिंदगी जीने के तौर-तरीकों के अध्ययन के लिए कराए गए निलसन अपर मिडिल एंड रिच सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में 98 फीसदी लोग स्थानीय भाषाओं में टीवी देखना पसंद करते हैं जबकि 70 फीसदी लोग अंग्रेजी अखबार पढ़ना पसंद करते हैं।
नीलसन के दक्षिण एशिया प्रमुख पार्थारक्षित के मुताबिक सर्वेक्षण कराने का असल मकसद पहले तो इस बाबत एक वास्तविक आंकड़ा इकटठा करना था और इसके बाद उनकी मीडिया और खपत की आदतों की पड़ताल करना। इस सर्वे में 35 महानगरों के 18,250 से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया था। सर्वे में तीन स्तरों पर समृद्धि आंकी गयी जिसमें उच्च मध्य, उच्च-उच्च मध्य और अमीर वर्ग शामिल थे। यह समूह कार, कम्प्यूटर, एलसीडी टीवी रखने के अलावा विदेश में छुटिटयां मनाने की काबिलियत के आधार पर बनाया गया था।
समृद्ध भारतीय तबके की अन्य आदतों का अध्ययन करते हुए इस सर्वेक्षण में बताया गया है कि 67 फीसदी लोग घर से बाहर फिल्में देखते हैं, 55 फीसदी इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, 54 फीसदी रेडियो सुनते हैं जबकि 38 फीसदी मैगजीन पढ़ते हैं और केवल 10 फीसदी लोग बिजनेस अखबार पढ़ते हैं।सर्वेक्षण में दिल्ली, बेंगलुरू, ग्रेटर मुंबई और चेन्नई को सबसे समृद्ध शहरों की श्रेणी में रखा गया है। इनके बाद हैदराबाद, कोलकाता, कोच्चि, पुणे, जयपुर और अहमदाबाद को रखा गया है। सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक भारत में कुल 25 लाख समृद्ध परिवारों में से 22 लाख परिवार उच्च-मध्यवर्ग में आते हैं जबकि उच्च, उच्च-मध्यवर्ग की श्रेणी में दो लाख परिवार हैं। इसके अलावा भारत में अमीर परिवारों की तादाद सिर्फ एक लाख है।
न्यूज चैनल के लिए तत्काल चाहिए
मीडिया में नौकरी दिलाने वालों से सावधान
भविष्य के पत्रकारों का सामान्य (अ)ज्ञान
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का शार्ट कट
चैनल में अफेयर न होने का अफसोस
मत पीटिए मीडिया के 'प्रोफेशनल' होने का ढिंढोरा
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वह न्यूज चैनल का प्रोड्यूसर है
रेडियो मिर्ची की दिलचस्प कहानी