दागदार दिखा2009 में मीडिया का दामन
-निरंजन परिहार
चलो एक साल और गुजर गया। हमारे सारे ही साथियों ने, जाते साल की परछाई में झांकने की मीडिया में सालों से चलती आ रही परंपरा को निभाया। कई सारे दोस्तों ने अपने चैनल पर दिखाने के लिए साल भर की घटनाओं पर आधे - आधे घंटे के कई प्रोग्राम बनाए। तो कुछ ने पूरे साल भर की घटनाओं को कुछ स्पेशल पैकेज में निपटाया। कई भाई लोगों ने अपने अखबारों के लिए फुल पेज के कई सारे स्पेशल फीचर तैयार किए। लेकिन अपनी नजर में किसी ने भी खुद के भीतर झांकने की कोशिश नहीं की। हम मीडिया वालों की सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि दुनिया को हम आईना देखने की सलाह देते रहेंगे। लेकिन खुद शायद ही कभी आईने में अपना चेहरा देखेंगे। लेकिन अपन ने कोशिश की। अपना मीडिया वाला चेहरा आइने में देखा। और, जब देख ही लिया, तो यह आपको यह बताने में कोई हर्ज नहीं है हुजूर, कि सन 2009 का अपने मीडिया का चेहरा बहुत दागदार दिखा। इतना दागदार, कि इससे पहले भारतीय मीडिया कभी, किसी को भी इतना बदसूरत नजर नहीं आया होगा।
बाकी बहुत सारी घटनाओं के साथ, यह साल अपनी ही करतूतों और करतबों के कारण मीडिया के लिए खराब रहा। पर, ऐसा नहीं है कि सब कुछ खराब ही हुआ। कुछ अच्छा भी हुआ। फिर भी कुल मिलाकर यह पूरा साल मीडिया के लिए अपनी साख बचाने की जद्दोजहद करने और जाते जाते मीडिया में मिशनरी की मशाल को फिर से जलाने की तैयारी के रूप में ही देखा जा सकता है।
साल की शुरूआत में, हमने देखा कि पी चिदंबरम का तो कोई दोष ही नहीं था। लेकिन फिर भी 2009 में हममें से ही एक ने कांग्रेस की प्रेस कॉन्फ्रेंस में गृहमंत्री चिदंबरम पर जूता फेंककर पूरे भारतीय मीडिया को असमंजस में डाल दिया। माना कि जरनैल सिंह सिख हैं। लेकिन 1984 में इंदिरा गांधी की मौत के बाद दिल्ली में सिखों पर हुए हमलों के पूरे 25 साल बाद उसके प्रतिकार की किसी भी पत्रकार से ऐसी बेवकूफी भरी उम्मीद तो कतई नहीं की जानी चाहिए। और रही बात ईमानदारी की, तो इस साल सबने पत्रकारिता को इस मामले में जमकर कलंकित किया। भारतीय पत्रकारिता के ज्ञात इतिहास में सन 2009 जैसा कोई साल नहीं आया, जब पत्रकारों, संपादको और मालिकों ने इतने बड़े पैमाने पर पैसे लेकर, बोली लगाकर और बाकायदा टैरिफ कार्ड पेश करके खबरों के खुलेआम बेचा हो।
पूरे देश में हर छोटे बड़े चैनल और अखबार, सभी ने अपने दाम तय कर रखे थे। कोई बाकी नहीं रहा। किसी ने खुलकर खेल खेला, तो कोई खेल खेल में ही खेल कर गया। सबने अपने कलम, कैमरे और कंप्यूटर की ईमानदारी को गिरवी रख दिया। माना कि बाजारीकरण ने पिछले कुछेक सालों में मीडिया की जुझारू धार को भोंथरा कर दिया है। लेकिन देश भर में खबरों को सामान की तरह बेचने का ऐसा धंधा, इतने बड़े पैमाने पर हम सबने इससे पहले कभी नहीं देखा।
साल भर में चैनलों को जारी हुए 50 नोटिस
इस साल विभिन्न चैनलों को आपत्तिजनक सामग्री के प्रसारण की शिकायतें मिलने के बाद करीब 50 नोटिस जारी किए गए। सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान यह जानकारी दी। उन्होंनेबताया कि आपत्तिजनक सामग्री के प्रसारण को लेकर कुछ चैनल स्वनियमन का पालन कर रहे हैं, लेकिन कुछ चैनलों ने ऎसा नहीं किया। उन्होंने समाजवादीपार्टी के ब्रजभूषण तिवारी के एक सवाल के जवाब में बताया कि इस साल आपत्तिजनक सामग्री के प्रसारण की शिकायतें मिलने के बाद विभिन्न चैनलों को करीब 50 नोटिस जारी किए गए। उन्होंने मनोनीत शोभना भरतिया के विभिन्न चैनलों पर पायरेटेड सामग्री का प्रसारण किए जाने संबंधी सवाल के जवाबमें बताया कि दो दिन पहले ही शेयरधारकों के साथ एक बैठक कर इस बारे में चर्चा की गई थीं। उन्होंने माना कि पायरेटेड सामग्री का प्रसारण एक गंभीर समस्या है।अंबिका ने बताया कि बैठक में मिले सुझावों पर विचार करने औरउन्हें लागू करने के बारे में एक समूह गठित किया गया हैं।
पर, ताकतवर लोगों के न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करने और फैसलों को अपनी तरफ खींचने के मामलों को रोकने में मीडिया की तारीफ की जानी चाहिए। मीडिया ने रुचिका गिर्होत्रा कांड में प्रभावशाली लोगों को बेनकाब किया और दिल्ली के बीएमडब्ल्यू केस में वकील के ही बिक जाने का मामला खुलकर उजागर किया। ऐसी धटनाओं ने मीडिया के मिशन वाले दिनों की याद ताजा की है। चार दशक से भारतीय राजनीति में प्रभावशाली नेता रहे और एक बार तो करीब करीब प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच चुके नारायण दत्त तिवारी के असली चेहरे को मीडिया ने ही उजागर किया। राजभवन के रंडीखाने में तब्दील करने वाले राजनेता को महामहिम से हटाकर महाकामुक के रूप में साबित करने का ताज मीडिया के सर पर ही है।
हमारे गुरू प्रभाष जोशी तो आखरी सांस तक मीडिया के बेईमान हो जाने पर मुहिम छेड़े रहे। गुरूजी जब तक रहे, खुलकर बोलते और लिखते रहे। उनका वही बोलना और लिखना अब मुहिम का रूप धर चुका है। इस पर गर्व किया जाना चाहिए कि खबरों को बेचने के खिलाफ हिंदी के एक संपादक की शुरू की गई मुहिम अब सबके मुंह चढ़कर बोलने लगी है। साल बीतते बीतते आईबीएन के संपादक राजदीप सरदेसाई ने खबरों को बेचने के धंधे को बंद करने की प्रभाषजी की मुहिम को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाने का ऐलान किया है। इसलिए अपना मानना है कि सन 2009 भले ही मीडिया को कई किस्म के कलंक देकर गया। पर, साथ ही कालिख पुते चेहरे के धुलने की उम्मीद भी जगा गया। आपको भी ऐसा ही लगता होगा ! (लेखक जाने-माने पत्रकार हैं। उनसे niranjanparihar@hotmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)
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