भविष्य के पत्रकारों का सामान्य (अ)ज्ञान
इन दिनों पत्रकारिता में नए लोग थोक के भाव आ रहे हैं। दिल्ली के अलावा छोटे-छोटे शहरों में भी पत्रकारिता पढ़ाने और सिखाने और पत्रकार बनाने का दावा करने वाले संस्थान कुकुरमुत्तों की तरह उग आए हैं। इन पत्रकारिता संस्थानों में एडमिशन लेने के लिए बस एकमुश्त मोटी फीस चुकानी होती है। जाहिर है जो भी बच्चे इन संस्थानों में एडमिशन ले रहे हैं उनके मन में पत्रकारिता के प्रति स्वभाविक रूचि कम और इसके ग्लैमर का आकर्षण ज्यादा होता है। हैरानी की बात तो यह है कि आईआईएमसी (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मॉस कम्युनिकेशन) जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में भी प्रवेश पाने की उम्मीद लिए ऎसे बच्चे परीक्षा देने पहुंच रहे हैं। इसी से संबंधित अनुभव को आपसे बांट रहे हैं आईआईएमसी के प्रोफेसर आनंद प्रधान। उनका यह आलेख हमने तीसरा रास्ता से साभार लिया है।
क्या आपको मालूम है कि बांग्लादेश की सम्मानित प्रधानमंत्री शेख हसीना का अंडरवर्ल्ड से ताल्लुक है। वे अंडरवर्ल्ड डॉन दाउद इब्राहीम की छोटी बहन हैं ? या ये कि वे पाकिस्तान की बड़ी नेता हैं और अपने नाम के मुताबिक वाकई हसीन हैं? या फिर यह कि वे विश्वसुंदरी हैं। और यह भी कि वे श्रीलंका की राष्ट्रपति हैं? ..... आपका सर चकरा देने वाली ये जानकारियां किसी बेहूदा मजाक या चुटकुले का हिस्सा नहीं हैं। ये वे कुछ उत्तर है जो देश के सबसे प्रतिष्ठित मीडिया प्रशिक्षण संस्थान में हिंदी और अंग्रेजी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा की प्रवेश परीक्षा में शेख हसीना और उन जैसी ही कई और चर्चित हस्तियों के बारे में दो-तीन वाक्यों में लिखने के जवाब में आए।
यह तो सिर्फ एक छोटा सा नमूना भर है। ऐसा जवाब देन वाले प्रवेशार्थियों की संख्या काफी थी जिन्हें महिंदा राजपक्से, रामबरन यादव, अरविंद अडिगा, हैरोल्ड पिंटर आदि के बारे में पता नहीं था। सबसे अधिक अफसोस और चिंता की बात यह थी कि इन छात्रों को जो पत्रकार बनना चाहते हैं, प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस जीएन रे और दक्षिण एशियाई पत्रकारों के संगठन साफमा के बारे में कुछ भी पता नहीं था। ऐसे छात्रों की संख्या उंगलियों पर गिनी जाने भर थी जिन्होने जस्टिस जीएन रे और साफमा के बारे में सही उत्तर दिया। हिंदी पत्रकारिता में प्रवेश के इच्छुक अधिकांश छात्रों ने लगता है कि नई दुनिया के संपादक और जाने-माने पत्रकार आलोक मेहता का नाम कभी नहीं सुना था।
आईआईएमसी की चार और शाखाएं खुलेंगी
नई दिल्ली। देश में भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) की चार नई शाखाएं खोली जाएंगी। एक शाखा जम्मू-कश्मीर और एक मिजोरम में और एक-एक शाखा दक्षिणी और पश्चिमी भारत में खोली जाएगी। इस बात का ऎलानसूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने नई दिल्ली में आईआईएमसी के 42 वें दीक्षांत समारोह के दौरान किया। अंबिका सोनी ने कहा कि ये संस्थान चरणबद्धतरीकेसे खोले जाएंगे और संबधित एजेंसियों, राज्य सरकारों से सलाहके बाद जल्द ही इनके प्रस्तावों को आखिरीरूप दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि आईआईएमसी का अंतर्राष्ट्रीय मीडिया विश्वविद्यालय के रूप में स्थापितकिया जाएगा। मंत्रालय इस संस्थान को विश्वस्तरीय मीडिया शिक्षा, प्रशिक्षण और अनुसंधान विश्वविद्यालय के रूप में विकसित करने के तौर तरीकों पर काम कर रहा है। फिलहाल यह संस्थान स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्रदान करता है। लेकिनअंतर्राष्ट्रीय मीडिया विश्वविद्यालय के रूप दिए जाने केबाद यह डिग्री देने लगेगा। इसके बादयह संस्थान स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के पाठयक्रम के साथ एम फिल और पीएच डिग्री भी देने लगेगा।
नतीजा यह कि प्रवेशार्थियों ने अपने काल्पनिक और सृजनात्मक सामान्य (अ) ज्ञान से इन प्रश्नों के ऐसे-ऐसे उत्तर दिए हैं कि उन्हें पढ़कर हंसी से अधिक पीड़ा और चिंता होती है। हैरत होती है कि इन छात्रों ने ग्रेजुएशन की परीक्षा कैसे पास की होगी? यह सचमुच अत्यधिक चिंता की बात है कि पत्रकारिता की प्रवेश परीक्षा में बैठने वाले छात्रों का न सिर्फ सामान्य ज्ञान बहुत कमजोर है बल्कि उनकी भाषा और अभिव्यक्ति क्षमता का हाल तो और भी दयनीय है। वर्तनी, लिंग और वाक्य संरचना संबंधी अशुद्धियों के बारे में तो कहना ही क्या? इन छात्रों की भाषा पर पकड़ इतनी कमजोर है कि वे अपने विचारों को भी सही तरह से प्रस्तुत नहीं कर पा रहे हैं।
यह ठीक है कि इनमें से बहुतेरे छात्रों की भाषा, अभिव्यक्ति क्षमता, तर्क शक्ति और सामान्य ज्ञान का स्तर बाकी की तुलना में बहुत बेहतर और संतोषजनक था। इससे संभव है कि संस्थान को छान और छांट कर जरूरी छात्र मिल जाएं लेकिन बाकी छात्र कहां जाएंगे? जाहिर है कि बचे हुए छात्रों की बड़ी संख्या दूसरे विश्वविद्यालयों और निजी पत्रकारिता और मीडिया संस्थानों में दाखिला पा जाएगी। उनमें से काफी बड़ी संख्या में छात्र डिग्रियां लेकर पत्रकार बनने के पात्र भी बान जाएंगे। संभव है कि पत्रकारिता पाठ्क्रम में प्रशिक्षण के दौरान उनमें सुधार हो लेकिन आज अधिकांश विश्वविद्यालयों और निजी संस्थानों में प्रशिक्षण और अध्यापन का जो हाल है, उसे देखकर बहुत उम्मीद नहीं जगती है।
निश्चय ही, समाचार माध्यमों के लिए अच्छी खबर नहीं है। अधिकांश समाचार माध्यमों और मीडिया उद्योग के लिए यह चिंता की बात है। वे पहले से ही प्रतिभाशाली मीडिया कर्मियों की कमी से जूझ रहे हैं। इसके कारण समाचार मीडिया उद्योग का न सिर्फ विस्तार और विकास प्रभावित हो रहा है बल्कि उसकी गुणवत्ता पर भी बुरा असर पड़ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में समाचार मीडिया उद्योग का जिस तेजी से विस्तार हुआ है, उसके अनुसार उपयुक्त प्रतिभाओं के न मिलने के कारण समाचार पत्रों और चैनलों के बीच वेतनमानों से लेकर सेवा शर्तों तक में बहुत विसंगतियां पैदा हो गयी हैं।
ऐसे में, समाचार मीडिया उद्योग के स्वस्थ विकास के लिए जरूरी है कि बेहतर प्रतिभाएं मीडिया प्रोफेशन में आएं। लेकिन इसके लिए समाचार मीडिया उद्योग के साथ-साथ देश के प्रमुख मीडिया प्रशिक्षण संस्थानों को मिलकर कोशिश करनी होगी। समाचार मीडिया उद्योग को मीडिया कर्मियों की भर्ती प्रक्रिया को तार्किक, पारदर्शी, व्यवस्थित और आकर्षक बनाना होगा और दूसरी ओर, प्रशिक्षण संस्थानों को बेहतर छात्रों को आकर्षित करने और उन्हें श्रेष्ठ प्रशिक्षण देने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने के बारे में तुरंत सोचना होगा। यह एक चुनौती है जिसे अब और टालना समाचार मीडिया उद्योग के साथ-साथ पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थानों के लिए भी बहुत घातक हो सकता है।
एशिया भर में मॉस कम्युनिकेशन के लिए सबसे बड़ी लाइब्रेरी का तमगा हासिल करने वाली आईआईएमसी (इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मॉस कम्युनिकेशन) की लाइब्रेरी कई खामियों से ग्रसित है। अव्यवस्था का आलम यह है की यहाँ पिछले सात साल से लाईब्ररियन का पद ही खाली पड़ा है। वैसे तो संस्थान की लाइब्रेरी में और भी कई खामियां हैं लेकिन यह समस्या बहुत ही बड़ी है। ऐसा अगर चंद दिनों या महीनों से होता तो कोई बात नहीं थी लेकिन सात साल तक एक प्रीमिअर संस्थान में( जिस संस्थान को सूचना और प्रसारण मंत्रालय चलाता हो उसमें) इस तरह की बात सामान्य नहीं कही जा सकती है। तिस पर संस्थान का प्रशासन कान में तेल डाले पड़ा हुआ है और संस्थान के सभी संकायों के शिक्षक इसपर बात करने से साफ़ मना कर देते हैं। उनका कहना है की इस मुद्दे पर हम कुछ नहीं कर सकते और ना ही कोई कमेन्ट देंगे। सारा काम प्रशासन के ज़िम्मे है। अब यह क्या माज़रा है की जिस संस्थान को सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा लाखों की फंडिंग मिलती हो और जिसके बारे में यह कहा जाता है की यहाँ हर छात्र पर 3-4 लाख रुपये(10 महीने में) का खर्चा आता है वहां एक अदद लाईब्ररियन की नियुक्ति नहीं हो रही है।
छात्रों से बात करने पर लाइब्रेरी की और कई खामियों के बारे में पता चलता है। मसलन, शेल्फ में रखी किताबों का अस्त-व्यस्त होना, हिंदी पत्रकारिता के लिए कम किताबें, साहित्य के किताबों की कमी, क्लास और लाइब्रेरी के खुलने-बंद होने के समय में टकराव आदि अनेक परेशानियाँ हैं। जब मैंने लाइब्रेरी के एक कर्मचारी राजबीर सिंह डागर से इन मुद्दों पर बातचीत की तो वो कई बातों को टाल गए। काफी सारी बातों के लिए उन्होंने छात्रों को हो ज़िम्मेवार ठहराया। कहा की वे ही किताबें इधर-उधर कर देते हैं। कुछ लोग ऐसा अपनी मनपसंद किताब को छुपाने के लिए भी करते हैं। कई शेल्फों पर स्टिक्कर नहीं लगे होने पर उन्होंने कहा की आगे से इसपर धयान दिया जायेगा। छात्र कई दिनों से लाइब्रेरी से संबंधित मुद्दे को उठा रहे हैं लेकिन महीनों गुज़र जाने के बाद भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं दिखाई दे रहा है। संस्थान को चाहिए की वो अपने नाम और जर्नलिज्म के लिए नंबर एक होने के ब्रांड के साथ न्याय करते हुए लाइब्रेरी को जल्द से जल्द दुरुस्त करे। (आम आदमी)
भोपाल। आने वाला वक्त एनीमेशन फिल्मों का है। एनीमेशन प्रस्तुति को थ्री डी के जरिये ज्यादा असरदार और वास्तविक बनाया जा सकता है। यह कहना है सिंगापुर की कंपनी मीडियाफ्रीक्स के कम्प्यूटर ग्राफिक्स जर्नलिस्ट और युवा एड फिल्म प्रोड्यूसर ईशान शुक्ला का। ईशान भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में विज्ञापन फिल्मों और उसमें एनीमेशन के प्रयोगों पर केंद्रित एक तीन दिवसीय कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। कार्यशाला के समापन अवसर पर ईशान ने बताया कि एनीमेशन के जरिये स्पेशल इफेक्ट्स भी काफी आसानी से दिखाए जा सकते हैं। फिल्मों और विज्ञापनों में आजकल एनीमेशन का प्रयोग बढ़ रहा है। एनीमेशन आज ज्यादा असरदार साबित हो रहे हैं।ईशान का कहना था कि आनेवाला वक्त एनीमेशन फिल्मों का ही है। युवा बड़ी तादद में इसके जरिये रोजगार पा सकतें हैं। उन्होंने यह भी कहा कि तकनीक की लाख प्रगति के बावजूद क्रिएटिविटी और आइडियाज की अपनी जगह बनी रहेगी। कार्यशाला में दुनिया की तमाम पुरस्कृत एड फिल्मों को प्रदर्शित कर छात्रों को इसकी तकनीक, प्रयोगों और लाभ से वाकिफ कराया गया। शुरुआत में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने मेहमानों का स्वागत किया। छात्रों की ओर से मृणाल झा, एनी अंकिता, नितिशा कश्यप और साकेत नारायण ने कार्यशाला से जुड़े अपने अनुभव सबके सामने रखे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कंप्यूटर विभाग के अध्यक्ष प्रो. चैतन्य पुरूषोत्तम अग्रवाल ने की। आभार प्रदर्शन विश्वविद्यालय के प्लेसमेंट ऑफिसर डॉ.अविनाश वाजपेयी ने किया।