तो मनोरंजन में हैहिंदी व्यंग्य विधा के जाने माने हस्ताक्षर आलोक पुराणिक के खास अंदाज से तो आप वाकिफ ही हैं। इस आलेख में उन्होंने खबरिया चैनलों में घटती खबरें और बढ़ती नाटकबाजी पर बड़ा ही सटीक व्यंग्य किया है। अगड़म-बगड़म से साभार प्रकाशित है आलोक पुराणिक का यह व्यंग्य।
बात मजाक की नहीं थी, पत्रकारिता के पांच छात्रों ने गंभीरता से कहा कि जिन चीजों की जरुरत अब की टीवी न्यूज में है, वह हमें कोर्स में पढ़ायी नहीं जा रही हैं। नाट्य रुपांतरण एक ऐसी टेकनीक हो गयी है, जिसका इस्तेमाल न्यूज को दिखाने में किया जाता है। आर के शर्मा, शिवानी भटनागर कांड को तमाम टीवी चैनलों ने ड्रामा बनाकर दिखाया। इस पूरी स्टोरी के ट्रीटमेंट में न्यूज के तत्व कम, नाटक के तत्व ज्यादा थे। जबकि किसी भी पत्रकारिता कोर्स में अभी तक नाटक को नहीं पढ़ाया जाता। क्राइम की तो लगभग सारी स्टोरियों में नाट्य रुपांतरण किया ही जाता है। ड्रामा कैसे पैदा किया जाये, ऐसा आम तौर पर पत्रकारिता में नहीं पढ़ाया जाता। पत्रकारिता की पुरानी परिभाषाओं के हिसाब से पत्रकारिता का दायित्व सूचना देना, शिक्षा देना होता है। पर पत्रकारिता और खास तौर पर टीवी पत्रकारिता के दायित्वों में एक काम और जुड़ गया है, मनोरंजन देना। न्यूज अब सिर्फ सूचना नहीं देती, उसका जिम्मा मनोरंजन करना भी हो गया है।
प्राइम टाइम के तमाम कार्यक्रमों को देखकर यह बात समझी जा सकती है। गंभीर खबरों के एंकर अब कई बार एक्टर की भूमिका में कार्यक्रमों में दिखायी पड़ जाते हैं।
पर ड्रामा मनोरंजन अभी भी पत्रकारिता के कोर्सों में नहीं है। वहां राजनीति शास्त्र है, अर्थशास्त्र है, भाषा से जुड़े पेपर हैं।
क्या पत्रकारिता कोर्सों, पत्रकारिता की शिक्षा के बारे में नये सिरे से विचार करने की जरुरत नहीं है।
यूं डिबेट इस पर हो सकती है और होनी भी चाहिए कि जिसे न्यूज के नाम पर दिखाया जा रहा है, क्या वह न्यूज है भी या नहीं।
शिवानी भटनागर, आर के शर्मा कांड का ड्रामा क्या न्यूज की श्रेणी में रखा जा सकता है।
या प्राइम टाइम के ड्रामा टाइप क्राइम शो न्यूज की श्रेणी में रखे जा सकते हैं या नहीं।
पर डिबेट होती रहेगी, इस बीच बच्चों को अगर इस सबके बारे में बुनियादी जानकारियां नहीं दी जायेंगी, तो बच्चे अपने टीचरों से यही कहेंगे कि जो इंडस्ट्री में चल रहा है, वह सब पढ़ाया क्यों नहीं गया। मनोरंजन ड्रामा टीवी मीडिया के सेंटर में कैसे आ गया, यह तो गहन विचार का विषय है। पर केंद्र में कितना आ गया, यह बात कुछेक आंकड़ों से साफ होती है।
न्यूज से कितनी कमाई है और मनोरंजन से कितनी कमाई है।
इसलिए न्यूज में मनोरंजन से मिलाकर कितनी कमाई की जा सकती है।
2006-07 में जी न्यूज का शुद्ध मुनाफा रहा-9.94 करोड़ रुपये।
इसी अवधि में मनोरंजन चैनल जी टीवी का शुद्ध मुनाफा रहा 166.21 करोड़ रुपये।
2006-07 में चौबीस घंटे का टीवी चैनल आजतक चलाने वाली कंपनी –शुद्ध मुनाफा था-31.10 करोड़ रुपये और कुछ घंटे की मनोरंजन प्रोग्रामिंग रोज टीवी पर दिखाने वाले प्रोडक्शन हाऊस बालाजी टेलीफिल्म्स का शुद्ध मुनाफा इस अवधि में था-79.43 करोड़ रुपये।
चौबीस घंटे की न्यूज दिखाकर जो कमाया जा रहा है, उसकी दोगुनी से भी ज्यादा रकम का मुनाफा कुछ घंटे की प्रोग्रामिंग वाला प्रोडक्शन हाऊस दिखा रहा है।
एनडीटीवी, जिसे अपेक्षाकृत गंभीर न्यूज चैनल माना जाता रहा है, भूत और अपराध, ड्रामा जहां सबसे कम है, का 2007-08 में घाटा था-6.89 करोड़ रुपये।
आंकड़े साफ बता रहे हैं कि कमाई किधऱ है।
कमाई न्यूज से ज्यादा मनोरंजन में है, यह बात जानने के लिए वित्तीय एक्सपर्ट होना जरुरी नहीं है। कातिल कब्रिस्तान जैसा प्रोग्राम एक बार बनाकर कई बार दिखाया जा सकता है। एक महीने बाद भी, एक साल बाद भी। पर हार्ड न्यूज सुबह की शाम को दिखाने में दिक्कत है। निवेश ज्यादा रिटर्न मनोरंजन में देता है, यह बात बालाजी टेलीफिल्म्स और किसी भी न्यूज चैनल के आंकड़ों की तुलना से साफ होती है।
एक दौर था, हाल तक ही, जब साफ तौर पर बच्चों को बताया जाता था कि न्यूज मीडिया अलग है और इंटरनेटमेंट मीडिया अलग है।
न्यूज यानी हार्ड फैक्ट्स, इंटरटेनमेंट यानी फिक्शन।
पर एक नयी कैटेगिरी अब बन रही है निक्शन-न्यूज आधारित फिक्शन। ये सारे नाट्य रुपांतरण निक्शन में आते हैं। यह अलग किस्म के हुनर की डिमांड करते हैं। न्यूज के सारे सिद्धांत यहां उलटे हो जाते हैं। न्यूज के सिद्धांत यानी आबजेक्टिविटी, कोई ओवरस्टेटमेंट नहीं, जैसा है, वैसा दिखाया जाये, अतिरंजना एकदम नहीं, एकदम संतुलित।
ड्रामा के सिद्धांत अलग हैं-नाटकीयता पैदा कीजिये। सीधे नहीं, तो नाट्य रुपांतरण टेकनीक से पैदा कीजिये। लाऊड होईये, जितना संभव हो। हाइपर होईये, जितना संभव हो। आबजेक्टिविटी कोई मसला नहीं है। ड्रामे की नींव आब्जेक्टिविटी की कब्र पर बनती है। पर सवाल यह है कि जहां आबजेक्टिविटी की कब्र बन रही हो, वहां क्या न्यूज की कब्र भी नहीं बन रही है। आर के शर्मा और शिवानी भटनागर कांड के ड्रामे क्या वाकई न्यूज बता रहे थे।
न्यूज बेस्ड फिक्शन यानी निक्शन की स्क्रिप्ट में ड्रामा चाहिए, वैसी कसावट चाहिए, जैसी सलीम जावेद टाइप स्क्रिप्ट में होती थी। भाषाई खेल चाहिए। .यह अनायास नहीं है कि टीवी न्यूज में ऐसे स्क्रिप्ट राइटर की डिमांड बहुत है, जो न्यूज में ड्रामा उतार सकते हों, भाषाई खेल से, विजुअल ट्रीटमेंट से। पर ये सारी चीजें तो फिल्म स्क्रिप्ट में पढायी जाती रही हैं, न्यूज नहीं।
पर अब न्यूज बेस्ड फिक्शन यानी निक्शन के जमाने में क्या हो। टीवी न्यूज ड्रामे को पसंद करती रही है। पर टीवी न्यूज अब ड्रामे को पैदा करने लगी है।
अब पत्रकारिता के बच्चों को अब क्या पढ़ाया जाये। बिजनेस चैनलों या विशेषज्ञ चैनलों को छोड़ दें, तो बिना ड्रामे के मुख्यधारा के चैनलों में काम नहीं चल रहा है।
पर क्या ड्रामा पत्रकारिता का हिस्सा हो सकता है। महत्वपूर्ण सवाल है। जवाब तलाशना जरुरी है। विश्वविद्यालय कालेज इस प्रश्न पर विचार करें या न करें, अपने पत्रकारिता के कोर्सों को बदलें या नहीं, पर निजी क्षेत्र के टेलीविजन कारोबारियों के सामने साफ ही है कि कमाई मनोरंजन में ही है, न्यूज आधारित मनोरंजन भी इसमें शामिल है।
मत पीटिए मीडिया के 'प्रोफेशनल' होने का ढिंढोरा
वह न्यूज चैनल का प्रोड्यूसर है
न्यूज चैनल के लिए तत्काल चाहिए
मीडिया में नौकरी दिलाने वालों से सावधान