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    मीडिया का क्यों चाहिए आजादी?

    इस आर्टिकल को हमने ब्लॉग कबाड़खाना स‌े स‌ाभार लिया है। लेख मीडिया स‌े स‌वाल भी करता है और मीडिया पर बंदिशे लगाने की कोशिश पर कटाक्ष भी करता है। लेख के साथ लेखक का नाम नहीं है। मुख्य तौर पर इस लेख के केंद्र में हिंदुस्तान के हिंदी न्यूज चैनल हैं। पेश है इस लेख का संपादित अंश।

    FreePressन्यूज चैनलों ने तो नाक में दम ही कर रखा है। इनकी वजह से ही लोगों ने देश की एक बड़ी पार्टी के मुखिया को रिश्वत लेते देखा, घूस लेकर सांसदों को सवाल पूछते देखा, हथियार खरीदने की ख्वाहिश पर मचा तहलका देखा...कानून को अंगूठा दिखाने वाले बद दिमाग रईसजादों को जेल जाते देखा ..पैसे लेकर फतवा देने वाले मजहबी दुकानदारों की पोल खुलते देखा...वगैरह...वगैरह। जाहिर है उसके अच्छे कामों की लंबी फेहरिस्त है। सत्तातंत्र के खुला खेल फर्ऱुखाबादी को बेपर्दा करने की उसकी ताकत बार-बार जगजाहिर हुई है। इसीलिए मुंबई हमले के बहाने इस 'दुश्मन' को निशस्त्र करने की कोशिश की गई। स्वाभाविक था कि न्यूज चैनल इसका जमकर विरोध करते। प्रधानमंत्री ने मुस्कराते हुए आश्वास्त किया कि सरकार मीडिया की आजादी को कहीं से कम नहीं करना चाहती। मानो उन्हें अपने सूचना प्रसारण मंत्री की उन कोशिशों की जानकारी नहीं थी, जिन्होंने मीडिया को मरणासन्न कर देने वाले दिशा-निर्देश तैयार कराए थे। खैर, अंत भला तो सब भला।

    हालांकि इस पूरी लड़ाई में न्यूज चैनल जिस तरह अकेले नजर आए, वो चौंकाने वाला है। विपक्ष के नेताओं ने कैमरे के सामने जरूर चिंता जाहिर की लेकिन न ही बुद्धिजीवियों, न ही देशभर में फैले मानवाधिकार या सामाजिक संगठनों को लगा कि लोकतंत्र खतरे में है। कहीं लोगों को ये तो नहीं लगता कि न्यूज चैनलों के आजाद या गुलाम होने से लोकतंत्र पर कोई फर्क पड़ने वाला है। ये वो बिंदु है जिस पर न्यूज चैनलों को आत्मनिरीक्षण की जरूरत है क्योंकि खतरा सिर्फ टला है, खत्म नहीं हुआ है।

    भारत में न्यूज चैनलों के विकास के साथ-साथ ये बात बहुत जोर देकर कही जाने लगी कि पत्रकारिता मिशन नहीं प्रोफेशन है। यहां प्रोफेशनल होने का अर्थ दक्षता तक सीमित होता, तो कोई बात नहीं थी, लेकिन इसका मतलब ये निकला कि ये भी साबुन या तेल बनाने जैसा कोई धंधा है जिसमें मुनाफा कमाना बुनियादी बात है। ऐसे में न्यूज चैनल घाटे का सौदा क्यों करते? उन्होंने खुद को कुछ महानगरों तक सीमित कर लिया जहां विज्ञापनदाताओं को प्रतिसाद देने वाला अच्छा-खासा उपभोक्ता वर्ग मौजूद था। नतीजा ये हुआ कि टीवी का पर्दा चकमक रोमांचलोक में तब्दील हो गया जहां सत्य के संधान से ज्यादा जनप्रिय होना महत्वपूर्ण हो गया। 'क्या' 'क्यों', 'कहां', 'कैसे', 'कब' और 'किसने' के जवाब से लोगों को लैस करने की बुनियादी जिम्मेदारी भुला दी गई। भारत में अपेक्षाकृत इस नए माध्यम को खबरों के लिहाज से साधने की जरूरत थी लेकिन चैनल मनोरंजन के मेले में तमाशगीर बनकर बैठ गए। लोगों ने भी इसका भरपूर मजा लिया। फिल्मों में टीवी रिपोर्टर मजाक की चीज बनकर प्रकट होने लगे और टीवी पर छाई राजू श्रीवास्तव, सुनील पाल एंड कंपनी ने जैसा और जितना चाहा, उनका चुटकुला बनाया।

    इसमें शक नहीं कि चैनलों ने आमतौर पर सांप्रदायिक सद्भाव के पक्ष में आवाज उठाई है, लेकिन ये भी सच है कि भड़काऊ बयान देने वालों को वे भरपूर स्पेस देते हैं। माहौल को उत्तेजक बनाए रखना इस धंधे का उसूल है। इसके अलावा न्यूज चैनलों ने जिस तरह सुबह-शाम ज्योतिषियों, बाबाओं औरहिंदूव्रत-पर्व-त्योहारों को महत्व देना शुरू किया, उससे अल्पसंख्यकों के बीच उन्हें लेकर पराएपन का अहसास बढ़ा है।
    इसके अलावा कभी वे नाग-नागिन, भूत-प्रेत के आगे दंडवत होते हैं तो कभी एलियन और साईंबाबा के चमत्कारों पर निहाल होते हैं। जबकि लोगों ने देखा है न्यूज चैनल के पुरोधा एसपी सिंह को, जिन्होंने गणेश मूर्तियों के दूध पीने के उन्मादी प्रचार के बीच मोची की निहाई पर दूध को जज्ब होते दिखाया था। जब लोगों को वैज्ञानिक कारण का पता चला तो उन्माद झाग की तरह बैठ गया। लोगों को न्यूज चैनल की ताकत का पता चला और एसपी को भरपूर सराहना मिली, जो जानते थे कि टेलीविजन महान वैज्ञानिक प्रयास का नतीजा है। इसका इस्तेमाल अंधविश्वास मिटाने के लिए होना चाहिए।

    साफ है कि जिन वजहों से पत्रकार और पत्रकारिता को सम्मान की नजरों से देखा जाता था... मीडिया की आजादी को जरूरी माना जाता था, वे बुरी तरह छीजीं हैं। न्यूज चैनल भूल गए कि मनोरंजन महान कला हो सकती है पर ये उनका काम नहीं है। मीडिया की आजादी के नाम पर अंधविश्वास फैलाना कानून के प्रति और युद्धोन्माद फैलाना इंसानियत के प्रति गुनाह है। खासतौर पर जब मसला भारत-पाक जैसे दो परमाणु हथियारों से लैस देशों का हो।

    हालांकि सभी चैनलों को एक ही तराजू पर तौलना ठीक नहीं। उनके तरीके और इरादे में फर्क जरूर है। पर ये फर्क परिदृश्य नहीं बदल पाता। कुछ संपादकों का कहना है कि टीवी अभी बच्चा है..धीरे-धीरे परिपक्व होगा। लेकिन वे भूल जाते हैं कि जब बच्चा बिग़ड़ता है तो मां-बाप पिटाई करते हैं, रिश्तेदार लानतें भेजते हैं और पड़ोसी अपने बच्चों को दूर रहने की सलाह देते हैं। न्यूज चैनलों के साथ फिलहाल यही हो रहा है। इसलिए इतना कहने से बात नहीं बनेगी कि चैनल आत्मनियंत्रण से काम लेंगे। जरूरी ये भी है कि जो वे नहीं कर रहे हैं, उसके बारे में भी गौर करें। उन्होंने देश के बहुमत को खारिज किया तो बहुमत उन्हें भी खारिज कर देगा। मीडिया की आजादी का सीधा संबंध, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत की मजबूती से है। एक के बिना दूसरे की गुजर नहीं।

    मत पीटिए मीडिया के 'प्रोफेशनल' होने का ढिंढोरा

    शर्मसार करता एक 'जनवादी' अखबार

    स‌ो रहा है मीडिया !

    अखबार के स‌ंपादक के नाम पाठक का पत्र

     

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