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  • मुजरिम की मुस्कान और मीडिया

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    -डॉ प्रवीण तिवारी

    पुलिस के आला अधिकारी ने पूरे पुलिसिया तंत्र का ग़लत इस्तेमाल करते हुए अपने पाप पर पर्दा डालने की कोशिश की। लोकतंत्र के तीन स्तंभ विधायिका न्याय पालिका, और कार्यपालिका का ‘इस्तेमाल’ कैसे करना है वो बख़ूबी जानता था और चौथा स्तंभ पत्रकारिता उस वक्त इतना सक्रिय नहीं था जितना आज है। ऐसा नहीं है कि 1990 में देश में पत्रकारिता नहीं होती थी लेकिन जिस तरह से इसे एक मुहिम का रंग दिया गया है और आम आदमी की संवेदनाएं रुचिका के टूट चुके परिवार के साथ जुड़ी हैं वो बात उस वक़्त के मीडिया में नहीं थी।

    rक्या ख़ास है आज के मीडिया में साहब? ख़ास है वो तस्वीरें जो बार बार आम आदमी से सवाल करती है की क्या लोकतंत्र उसके लिए है; या उसके लिए जो सज़ा मिलने के बावजूद मु्स्कुराता हुआ अदालत से बाहर निकलता है। ये मुजरिम जानता है की अपने रसूख और क़ानून की तकनीकी पेचीदगियों को समझने की इसकी क्षमता की वजह से ये सस्ते में निपट गया। लेकिन आज के मी़डिया की ख़ासतौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ये ख़ासियत है कि वो आम आदमी को उसकी बेचारगी का एहसास कराता है। जब भी इस सज़ायाफ्ता मुजरिम की कुटिल मुस्कान स्क्रीन पर आती है वो सीने तीर सी घुसती है।

    मैं एक पत्रकार के साथ साथ एक आम आदमी भी हूं और विश्वास जानिए इस सिस्टम में मैं ख़ुद को भी उतना ही बेचारा पाता हूं जितना गिरहोत्रा साहब जिनसे मुलाक़ात के बाद मेरे रौंगटे खड़े हो गये। गिरहोत्रा साहब को आप जानते होंगे, जो नहीं पहचान रहे उन्हें बता दूं की वो रुचिका के पिता है। श्रीराम और पांडवों के अज्ञातवास से भी लंबा इनका अज्ञातवास रहा जो पूरे 19 साल चला। इसकी वजह थी चहुं ओर कलयुगी रावण का असर और पंगु सिस्टम की मजबूरी। रुचिका के परिवार में घबराहट इतनी है कि इस मामले में उनके वकील पंकज भारद्वाज से उनकी सालों मुलाक़ात नहीं हुई सिर्फ़ टेलिफोन पर बातचीत होती रही। रुचिका का भाई आशु अब भी किसी के सामने नहीं आता क्योंकि अब उसकी बेटी भी 13 साल की हो गई है। आशू का कहना है बहन को तो खो दिया अब बच्ची और बाक़ी बचे परिवार को बचाना है। ये वहीं आशू है जिन पर इस मामले के सामने आने के बाद सजायाफ्ता राठौर के इशारे पर इतने केस मढ़ दिये गये और इतना पीटा गया कि इसकी दहशत आज तक उन के ज़ेहन से नहीं निकल पाई।

    spsनीलम कटारा और नीलम कृष्णमूर्ती जैसे सिस्टम के सताए और रुआबदार लोगों के पैरों तले कुचले गए आम लोगों से भी इस मसले पर बात हुई। इनका भी कहना है मीडिया की मुहिम सराहनीय है लेकिन क्या ये अंजाम तक पहुंचेगी? इन लोगों के मामले में भी सिस्टम बेनक़ाब तो हुआ लेकिन क्या सुधरा? ये मौका है जब मीडिया ये साबित कर सकता है कि उसका काम सिर्फ ख़बरे दिखाना या किसी मुहिम को बनाना मात्र नहीं बल्कि इसे अंजाम तक पहुंचाना और सिस्टम में ठोस परिवर्तन लाना भी है। इस मुहिम के दौरान मेरी रुचिका मामले से जुड़े हर अहम किरदार से बातचीत हुई है। उस वक्त के नेता, अधिकारी सभी अब एक दूसरे के पाले में गेंद डाल रहे हैं। क्योंकि अब कोई भी असरदार नहीं, गृहमंत्री अब कुछ नहीं रहे, डीआईजी आईजी जैसे अधिकारी अब अपनी पेंशन इंज्वाय कर रहे हैं। ख़ुद राठौर अब उतना असरदार नहीं जितना अपने कार्यकाल में था। दो बातें हैं अगर राठौर आज भी असरदार होता तो क्या ये मुहिम बनती और दूसरी अगर उस वक़्त मीडिया इतना सक्रिय होता तो क्या राठौर का असर इतना काम करता? कौनसी बात ज़्यादा मज़बूत है इसका जवाब इस मुहिम के अंजाम के बाद ही पता लगेगा।

    अंजाम क्या हो ये एक अहम सवाल है जवाब रुचिका के पिता की जबान से, उनका कहना है, "मैं मीडिया का आभारी हूं, कि आज पूरे देश की संवेदनाएं हमारे साथ हैं। अब मेरी ज़िंदगी तो बिखर चुकी है, बेटी रही नहीं, बेटा आज भी खौफज़दा हैं। मुझे इससे बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता की अब फैसला क्या होता है। अहम बात है वो संवेदनाएं जो उस आम आदमी की हैं, जो मेरी दर्दनाक कहानी में खुद को देखता है। जो भी हो ऐसा कुछ न हो जिससे उसका मनोबल गिरे या उसे झटका लगे। एक परिवार के साथ अत्याचार हो गया सो हो गया, मेरा विश्वास सिस्टम से उठ गया सो उठ गया, बाकियों का विश्वास तो मत खोने दो।"

    राठौर की मुस्कुराहट कहीं नज़ीर न बन जाए रूआबदारों की ताक़त के बेजा इस्तेमाल की। मौक़ा हमारे पास भी है की इस मामले को इसके अंजाम तक पहुंचा कर हम भी एक नज़ीर तैयार करें की अपराधी कितना भी रसूखदार हो पहुंचेगा अपने अंजाम तक। देश आज रुचिका के साथ खड़ा है ये उसके लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है लेकिन ये आवाज़ भी दूसरे हाई प्रोफाइल मामलों की तरह कहीं वक़्त के साथ ठंडी न पड़ती जाए ये एक डर भी आम आदमी को सता रहा है। (लेखक लाइव इंडिया न्यूज चैनल में एंकर हैं)

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