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  • अमर उजाला के सं‌पादक महोदय जरा गौर फरमाएं

    वीओएम डेस्क। न्यूज चैनलों के मुकाबले हमेशा खुद को बेहतर बताने वाले अखबारों में क्या छप रहा है उसकी एक बानगी देखिए। उत्तर प्रदेश के प्रमुख हिंदी दैनिक अमर उजाला के एक संस्करण की यह कटिंग हमें दिल्ली के एक न्यूज चैनल के प्रोड्यूसर ने प्रेषित की है।

    auअखबार में इस खबर को जिस तरीके से पेश किया गया है वह वाकई में हास्यास्पद है। चार कॉलम में तस्वीरों के साथ प्रकाशित यह खबर भारतीय सेना के एक सूबेदार की मौत से संबंधित है। खबर के मुताबिक सूबेदार की मौत हार्ट अटैक से हुई है। इसके बावजूद उसे शहीद बताया गया है। पूरी खबर को इस तरह पेश किया गया है जैसे उक्त सूबेदार ने किसी लड़ाई में अपनी जान गंवाई हो। यह समझ से परे है कि डीजल टैंक लेकर जा रहे एक सूबेदार की हार्ट अटैक से हुई मौत शहादत की श्रेणी में कैसे आ गई?

    अखबार लिखता है कि एक जांबाज सैनिक ने सरहद पर अपने प्राणों की आहुति दे दी। अंतिम स‌ंस्कार के वक्त वहां के माहौल की जानकारी देते हुए रिपोर्टर लिखता है,  एक ओर जहां स‌ूबेदार रामकिशोर की शहादत स‌े स‌भी गौरवान्वित हो रहे थे वहीं इस बात का भी गम था कि अब वे कभी अपने गांव के जांबाज स‌े न मिल स‌केंगे। फख्र स‌े जहां शहीद के परिजनों का स‌ीना चौड़ा था वहीं जुदाई का गम आंखों में झलक रहा था।

    हम साफ कर दें कि हमारे मन में मृत सूबेदार के प्रति सम्मान में कोई कमी नहीं है। लेकिन खबर तथ्यों के आधार पर लिखी जाती है और तथ्य यही है कि जम्मू में तैनात सूबेदार रामकिशोर की मौत हार्ट अटैक से हुई है। इसलिए रामकिशोर की मौत को शहादत की श्रेणी में रखना किसी भी तरह गले नहीं उतरता। इसके स‌ाथ ही हम यह भी कहना चाहेंगे कि हमारे इस नजरिये पर अगर किसी को आपत्ति हो तो हमें अपना नजरिया लिखें, हम आपके विचारों का स्वागत करेंगे-संपादक। हमारा पता है- editor@voiceofmedia.com

  • विशेषांक

    मीडिया के बरअक्स स्त्री विमर्श करती एक पत्रिका

    mmभोपाल। मीडिया और स्त्री के बीच बनते नए संबंधों को उजागर करता है मीडिया विमर्श का नया अंक। पत्रिका ने अपने वार्षिकांक को मीडिया और महिलाएं पर केंद्रित किया है। इस विशेष अंक में आज के वक्त में मीडिया और स्त्री के विभिन्न आयामों को उजागर किया गया है। 88 पेज की इस पत्रिका में 33 लेख संकलित हैं। इस अंक में कमल कुमार, उर्मिला शिरीष, डॉ. विजय बहादुर सिंह, अल्पना मिश्र, जया दाजवानी, सच्चिदानंद जोशी, इरा झा, रूपचंद गौतम, मंगला अनुजा, गोपा बागची, डॉ. सुभद्रा राठौर, संजय कुमार, हिमांशु शेखर, रूमी नारायण, जाहिद खान, अमित त्यागी, स्मृति जोशी, कीर्ति सिंह, मधु चौरसिया, लीना, संदीप भट्ट, सोमप्रभ सिंह, निशांत कौशिक, पंकज झा, सुशांत झा, माधवीश्री, अनिका ओरोड़ा, इफत अली, फरीन इरशाद हसन, मधुमिता पाल, उमाशंकर मिश्र, डॉ. महावीर सिंह और रानू तोमर के आलेख संग्रहीत हैं।

    संपादकीय में प्रख्यात कवि अष्टभुजा शुक्ल ने लिखा है, मीडिया हमारे समय का बहुत प्रबल कारक है और स्त्री हमारे समय में अपनी पहचान दर्ज कराने के लिए जद्दोजहद कर रही है। स्त्री मीडिया की तरफ आशा भरी निगाहों से देख रही है, जबकि मीडिया स्त्री को लोलुप निगाह स‌े...। मीडिया अपनी चमक बढ़ाने के लिए स्त्री का उपयोग करने को आतुर है। यह अंक पत्रकारों, मीडिया विश्लेषकों, शोध छात्रों, मीडिया विद्यार्थियों के लिए कई मायनों में अहम है। मीडिया विमर्श का अगला अंक दिवंगत पत्रकार प्रभाष जोशी को स‌मर्पित है।

रोकना ही होगा अखबारों के इस 'काले धंधे' को 

जारी है अखबारों में 'मिलावट' के खिलाफ मुहिम

मत पीटिए मीडिया के 'प्रोफेशनल' होने का ढिंढोरा

खबर लहरिया को यूनेस्को स‌म्मान

मीडिया में नौकरी दिलाने वालों स‌े स‌ावधान

खबरें जाएं भाड़ में, मुनाफा तो मनोरंजन में है

पत्रकार बेचारा, काम के बोझ का मारा

पांच मंडल के पत्रकारों को मान्यता की हरी झंडी

धनुष ब्रेक की ब्रेकिंग न्यूज

डाकू का 'एक्स‌क्लूसिव' स‌रेंडर

ब्रेकिंग न्यूज की मजबूरी क्यों? 

दूरदर्शन में अब भी है दम  

भाषाई स‌रोकार और मीडिया 

अब न्यूज चैनल की 'दुकान' खोलना आसान नहीं 

क्यों नहीं कर पाए स‌च का स‌ामना?

दोबारा शुरू हुआ एग्रीग्रेटर  ब्लॉगवाणी

कामयाबी उम्मीदें बढ़ाती है: विजेंद्र

जल्दी में हैं बाबा रामदेव?

मैडम फिजा कुछ तो तमीज स‌ीखिए... 

शर्मसार करता एक 'जनवादी' अखबार

भगवा ओढ़ने को बेकरार पीली छतरी वाले

जी की जय, बाकी चैनलों के लिए मंदी बनी शोषण का हथियार 

दिनामलार के स‌ंपादक को जमानत

अखबारों को ये क्या होता जा रहा है?

इतिहास हो गया जियो-सिटीज

'हम न तो कोई जवाब देंगे और न ही उन्हें गालियां देंगे'

अब हिंदी में होगा डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू...

हिंदी ब्लॉग जगत को तोहफा, नया एग्रीग्रेटर 'ब्लॉग प्रहरी' लांच

नहीं रहे खबरों के शिल्पकार डॉ. रामकष्ण पांडेय

आर्थिक पत्रकारिता: बढ़ रही है 'अर्थ' की अहमियत

अब आया यूएनआई टीवी

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